स्तनों से मातृत्व तक
तन के आकर्षण से चला, मन का पहला ज्ञान।
मोह-जाल में उलझता, भटका मेरा ध्यान॥
रूप-सौंदर्य की चाह में, बीता जीवन-काल।
इच्छाओं के फेर में, मन भी था बेहाल॥
नारी केवल देह नहीं, नारी जीवन-धार।
उसमें ममता, प्रेम है, बसता स्नेह अपार॥
माँ के आँचल में मिला, जीवन का उपहार।
ममता के उस दूध में, पाया सच्चा प्यार॥
जिसको केवल रूप ले, मन ने माना खास।
माँ की ममता देखकर, मिटे सभी भ्रम-पाश॥
तन से मन की ओर फिर, बढ़ने लगा विचार।
प्रेम हुआ जब मातृमय, बदला ये संसार॥
काम-कुहासा छँट गया, जागा निर्मल ज्ञान।
नारी के सम्मान में, देखा सच्चा मान॥
मीरा, सूर, कबीर से, सीखा प्रेम-विवेक।
देह नहीं आधार है, निर्मल भाव है नेक॥
नारी को सम्मान दो, मत बाँटो आकार।
उसकी चेतन आत्मतव, समझो सदा उदार॥
माँ, बहना या प्रेमिका, सभी रूप अनमोल।
इनके पावन प्रेम का, जग में कहाँ है मोल॥
मोह ने मुझे बाँधकर, रखा बहुत दिन दूर।
ममता ने तब खोल दी, अंतर की हर डोर॥
अब नारी को देखता, केवल देह न मान।
उसमें जीवन, प्रेम है, उसमें पूरा प्राण॥
क्षमा करो हे मातृरूप, मेरे मन के रोष।
पावन ममत्व रूप ने, हर ली मन की दोष॥
कभी स्तनों ने बाँधकर, उलझाया था ध्यान।
मातृत्व ने मुक्त कर, बदली सब पहचान॥
— डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’
