राजनीति

चाय से गायब होती मिठास और बेबस आम आदमी

सुबह की पहली चुस्की अगर फीकी लगने लगे तो समझ लीजिए कि महँगाई अब सिर्फ़ आंकड़ों और सरकारी दावों का हिस्सा नहीं रही, बल्कि आम इंसान की दिनचर्या में ज़हर घोलने लगी है। भारतीय समाज में चाय केवल एक पेय पदार्थ नहीं है, यह श्रमजीवियों की ऊर्जा, मेहमान नवाज़ी का प्रतीक और हर वर्ग के जुड़ने का माध्यम है। लेकिन जिस तरह से शक्कर के दाम आसमान छू रहे हैं, उसने आम जनता के मुँह से मानो मिठास छीन ली है। रसोई के बजट में लगातार होती यह सेंधमारी अब सिर्फ़ अर्थव्यवस्था का विषय नहीं रही, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक सवाल बन चुकी है।

बाज़ार में शक्कर की कीमतों में उछाल के पीछे अक्सर उत्पादन में कमी, मौसम की मार और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की स्थितियों का हवाला दिया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतिगत स्तर पर इस तरह के संकटों का पूर्व आकलन नहीं किया जा सकता। सत्ता के गलियारों में जब चुनाव आते हैं तो महँगाई पर लगाम लगाने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, परंतु ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि बुनियादी चीज़ों के दाम बेकाबू होते ही पूरी व्यवस्था मौन धारण कर लेती है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल बयानों तक सीमित रह जाता है और जनहित से जुड़ा यह गंभीर प्रश्न महज़ एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनकर रह जाता है।

महँगाई की यह मार सबसे ज़्यादा उस मध्यमवर्ग और गरीब तबके पर पड़ती है जिसकी आय सीमित है। चाय के छोटे ठेले चलाने वाले, हलवाई और रोज़ कमाने-खाने वाले मज़दूरों के लिए चीनी के दाम बढ़ना सीधा उनकी आजीविका पर प्रहार है। जब जेब हल्की होती है तो सबसे पहले थाली का स्वाद और जीवन की मिठास गायब होती है।

सरकार को केवल बाज़ार के भरोसे जनता को छोड़ने के बजाय सख्त प्रशासनिक कदम उठाने होंगे। जमाखोरी पर कड़ाई से अंकुश लगाना, राशन प्रणाली के माध्यम से आम जनता को रियायती दरों पर शक्कर उपलब्ध कराना और घरेलू बाज़ार की ज़रूरतों को प्राथमिकता देना बेहद आवश्यक है। अगर वक्त रहते रसोई की इस कड़वाहट को दूर नहीं किया गया, तो जनता का यह शांत असंतोष किसी दिन व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।