हास्य व्यंग्य

इटिंग सुगर? नो पप्पा!! (व्यंग्य)

देश में फिर ‘सुगर’ बढ़ गई। नहीं ! देश की ‘सुगर’ चढ़ गई!! पक्ष-विपक्ष, भक्त-अंधभक्त-देशभक्त सब परेशान हैं यहाँ तक कि वे डायबिटीज के रोगी भी दुखी हैं, जो चीनी की जगह सुगर-फ्री का इस्तेमाल वर्षों से कर रहे हैं। कमबख्त ये सुगर है ही बड़ी बेकार बीमारी। डॉक्टर कहते हैं कि बड़ा खतरा है इससे। ना जाने आँख फोड़ दे! दाँत तोड़ दे!! टाँग कटवा दे!!! किडनी बर्बाद कर दे!!!! लकवा मरवा दे!!! और तो और दिल की धड़कन रुकवा दे। भैया, अपुन की तो समझ में नहीं आता लोग इस मीठास के दीवाने क्यो हैं? जब पता है कि ज्यादा मीठे में कीड़े लगते हैं, तो छोड़ो उसको। लेकिन नहीं क्या करें जब दशा कबीर बाबा की मक्खी की तरह हो जाए तो क्या कर सकते हो? अब चिपको और मरो। बाबाजी तो छः सौ साल पहले ही इशारे में समझा गये थे –
“माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रह्यो लपटाय।
हाथ मलै और सिर धुने, लालच बुरी बलाय॥”
पर दद्दू की सुनता कौन है? ना तब सुनी और ना अब। भैया, सारी समस्या का कारण है लालच।
इन दिनों सबको देश की चिंता खाए जा रही है। आरक्षण की चाशनी का लालच सुगर से भी भयानक है। जिसने चाट लिया, उसे छोड़ना ही नहीं चाहता। देशभक्त, दशकों से ये चाटनी ‘पी’ रहे हैं। देशभक्तों को देश की चिंता है कि यदि आरक्षण खत्म हो गया तो, उनकी संतानों का भविष्य अंधकार में डूब जाएगा। बेचारा बच्चे को गर्भ में ही ‘सुगर’ हो जाती है। पैदा ही कमज़ोर और विकलांग होता है। नश्वर जगत में पदार्पण के पश्चात जब उसे आरक्षण की सुगर की ‘खुराक’ मिलती है तो यह कमज़ोर बड़े-बड़े प्रतिभासंपन्न बहादुरों को धूल चटा देता है। वयस्क होने पर यह कमज़ोर तो ताकतवर बन जाता है लेकिन ‘खुराक’ का असर फिर खत्म हो जाता है। उसकी औलाद फिर कमज़ोर ही पैदा होती है। देशभक्त आजादी की लड़ाई में बलिदान करनेवाले सेनानियों के त्याग और बलिदान के समर्पण के आगे नतमस्तक है। सीमा पर सिपाहियों की कुर्बानियों की तारीफ करता है पर बेचारा देश की रक्षा के लिए ‘खुराक’ नहीं छोड़ता। उसे डर है कि उसका गधा यदि घोड़ा न बन पाया तो देश पिछड़ जाएगा। इस ‘खुराक’ को चाटने के लिए उसका ‘पिछड़ापन’ बहुत जरूरी है।
ये भी देशभक्ति का ‘मॉर्डन-फॉर्मूला’ है।
कॉन्वेंट की शिक्षा, इस देश के बच्चे को ‘जॉनी’ बनने का सौभाग्य देती है। ये जॉनी बड़ा बदमाश है। सुगर भी खाता है, झूठ भी बोलता है और मुँह खोलने के बाद ठहाका -“हा! हा!! हा!!!” लगातार ‘पप्पा’ को चिढ़ाते और बुद्धू भी बनाता है। जो भी इस जॉनी का पप्पा बनता है, वह इसे नाराज़ नहीं करना चाहता क्योंकि, यही जॉनी तो है जो उसके पितृत्व की गरिमा-महिमा और कुर्सी को बचाए हुए है। इसलिए जॉनी बेटा को चीनी की कीमत बढ़ने पर दिल नहीं दुखाना चाहिए। जॉनी बेटा अब महँगे गुटखे खाने लगा है। बार और रेस्टारेंट में विदेशी शराब भी पीने लगा है। पर महँगी सुगर पचाना मुश्किल है।
इस देश में सुगर तो उसकी बढ़ जाती है जो चाह कर भी मीठा नहीं चख पाता। उसकी ‘चीनी’ अंदर से बढ़ती है तो उपचार के अभाव में सुगर से मर जाता जाता है और बाहर से बढ़ती है तो महँगाई के अत्याचार से मर जाता है। देशभक्तों! अब ‘खुराक’ लेना छोड़ो और देश को सुगर से बचाओ नहीं तो ये कीड़े भारत को खोखला कर डालेंगे। और जॉनी गाता रहेगा – इटिंग सुगर?…. नो पप्पा!!

— शरद सुनेरी