कविता
आओ रक्षाबंधन प्रण ये करें
आओ रक्षाबंधन प्रण ये करें,
हर नारी के सम्मान की ढाल बनें।
राखी की डोर भले कलाई पर न हो,
पर हर लड़की की रक्षा में मिसाल बनें।
राखी केवल धागा नहीं,विश्वास है,
हर नारी के सम्मान का एहसास है।
जो कमजोर समझकर उसे सताए,
उसके विरुद्ध खड़ा होना ही प्रयास है।
चाहे कोई राखी बाँधे या न बाँधे,
रक्षा का संकल्प दिल में रखना।
हर लड़की की राह सुरक्षित हो,
बस इतना अपना धर्म समझना।
नारी में माँ,बहन,बेटी का रूप है,
उसके सम्मान में जीवन का स्वरूप है।
जो उसकी मर्यादा की रक्षा करता,
वही सच्चे अर्थों में मनुष्य अनूप है।
चाहे कलाई पर राखी हो या न हो,
बहन का प्यार कभी कम नहीं होता।
किशन हर बेटी की इज़्ज़त अपनी समझो,
इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं होता।
— किशन सनमुखदास भावनानी
