यूँ ही अचानक!
यूँ ही अचानक एकाकीपन में,
आज फिर उपस्थिति हुई तुम्हारी,
सहरा में जैसे सुमन खिल गया हो,
खुशी से आंखें हो गईं नम हमारी।
अब तो हर पल लगे सुहाना मीत,
हवा ने छेड़ी सरगम गाएं बादल,
मन में लहर उमंग की उछली प्रीत,
पत्ता-पत्ता हुआ ज्यूं खुशी से पागल।
तन्हाइयों में डूबी थी जिंदगानी,
मिल गया आज उसको किनारा,
हर पल जैसे हो गया नई कहानी,
यादों का फिर खुल गया पिटारा।
याद आते हैं किस्से हसीं शामों के,
खिला चाँद वो चाँदनी रातों के पल,
मीठे-सुवासित वो खत पयामों के,
काँटों-सी चुभे तुम बिन पवन शीतल।
— लीला तिवानी
