गेलिस
चमन लाल बहुत कमज़ोर हो चुके थे। एक साल से चल रही बीमारी ने उन्हें झटक दिया था, शारीरिक तौर पर भी, मानसिक तौर और माली तौर पर भी। आज डॉक्टर के यहाँ चेक-अप के लिए जाना था।
एक साल में वज़न घटकर 75 का 50 हो गया है। पैंट में सिलाइयाँ लगवा के भी वे कमर और टाँगों में ढीली ही आती हैं। अंदर पाजामा पहनकर वे टाँगों का ढीलापन तो छुपा लेते हैं लेकिन कमर का क्या करें। बेल्ट का छेद खिसकाने के लिए भी मोची के पास जाना पड़ेगा। अब इतनी ताकत कहाँ बची थी। किसी और को वे यह काम करने भी न देंगे, स्वावलम्बी भी बहुत हैं।
पहले जब-जब पेट बढ़ने से कमर का साइज़ बढ़ता तो वे स्वयं ही बेल्ट में कील ठोंककर आगे छेद कर लेते थे। अब हथौड़ा उठाने की ताकत ही कहाँ बची थी। एकाध बार छेद को पीछे करने के लिए हथौड़ा उठाया तो वह हाथ से छूटते-छूटते बचा। कहीं पैर पर ही गिर जाता तो…?
पैंट पहन कर चमन लाल खड़े हुए तो बेल्ट समेत ही पैंट नीचे खिसकने लगी। मजबूर निगाहों से उन्होंने मालती को देखा। पास ही पोते गौरव की गेलिस पड़ी हुई थी। मालती ने झट से उठाकर वह चमनलाल के हाथों में दे दी।
जाने किस तीव्रता से उसने गेलिस दे तो दी लेकिन तुरंत ही उसे याद आया कि गौरव को गेलिस लगाए हुए देखकर वे कितना भड़के थे।
“उतारो ये गेलिस। तुम आज़ाद बच्चे होकर अपनी निकर नहीं सँभाल सकते हो?” कहकर गेलिस निकालकर फेंक दी थी उन्होंने और बहू की भी फटकार लगाई थी, “तुम जानती नहीं? यह गेलिस गुलामी की निशानी है। यह तुम्हें हर समय परतंत्रता और परावलम्ब का अहसास कराती रहती है। बाहर फेंक दो इस गेलिस को। यह मनुष्य से उसका स्वाभिमान छीन लेती है। उसे आश्रित बना देती है। उसे खुद सँभालने दो अपने आप को।”
याद आते ही मालती ने गेलिस वापस लेने के लिए हाथ बढ़ाया। देखा कि चमन लाल सामने से गेलिस की दोनों इलास्टिक पट्टियों के क्लच को कस चुके हैं। मलती के बढ़े हुए हाथ में उन्होंने पीछे लगने वाले क्लच को पकड़ाकर उचित स्थान पर जमाने के लिए कहा।
— डॉ. आरती लोकेश गोयल
