संस्मरण

संस्मरण : दारू गगन की छांव

बाप जब भी दारू पीकर घर आता, मुझसे एक ही बात कहता ” बेटा, मैं तुम्हारा दिया नहीं उडाता हूं । जो भी तुम हर माह मुझे देता है, सब रख देता हूं, मेरे मरने के बाद सब मिल जायेगा। खोज लेना तब..!”
मृत्यु के दो दिन पहले भी वह पिये हुए आकर कहने लगा था” बेटा, बाप को पिया हुआ देख, ज्यादा दुखी मत होना, मुझसे नफ़रत मत करो, बरसों की पीने की आदत है, मरने के बाद ही छूट पाएगी…! “
मुझे क्या पता था बाप बेटे के बीच का यह अंतिम शब्द संवाद होगा । मैंने समझा हमेशा बोलता है, आज भी बोल रहा है । और हमेशा की तरह बिना जवाब दिए उस शाम भी उसकी बात मैंने सुन ली थी। लेकिन उस दिन उसका कहा ” बरसों की आदत है बेटा, मरने के बाद ही छूट पाएगी ” मन को वेध गया था । मैं उसकी ओर देखा तो वह दूसरी ओर देखने लगा था। यह उसकी उपेक्षा थी या हमसे कुछ अपेक्षा थी, तत्काल मैं समझ नहीं पाया था । कारण मुझे बाप पर कभी भरोसा नहीं हुआ और न कभी उसकी कही बातों पर यकीन कर पाया था । वह सगा बाप था पर कभी मुझे सगा बाप लगा नहीं। बचपन से देखता आ रहा था । बाल बच्चों के साथ कभी वो जिया नहीं। हमारा पेट कभी उसने भरा नहीं,लोगों के बुलावे पर रात- कुरात घर से चले जाना और दिन भर औझा गिरी, झाड फूंक करना और अपना पेट भरना, यही उसका जीवन था। जीने का यही उसका मकसद था। घर परिवार और हमारे लिए माँ‌ ही सब कुछ थीं । उधर बाप था जो पिये हुए हालत में हर दिन कुछ बातें जोड़ता – घटाता रहता था। कभी यह भी कह देता – ” दारू छोड़ने की बात मैं कभी नहीं कह सकता हूं ‌। झूठ मूठ का वायदा करना मुझे आता नहीं..!”
वह कलरफुल जीवन का आदी नहीं था। बस जीवन में थोड़ी रस रंग की चाहत रखता था । और उसके हिसाब से यह बुरा नहीं था । माँ के गुजर जाने के बाद उसके पैर कुछ बहकने लगे थे। मैंने भाई से कहा कि इस पर थोड़ी नज़र रखो, लेकिन मैंने ही उसे मना कर दिया,” उसे अपनी जिंदगी जीने दो, कितने बरस जियेगा, टोका टाकी से उसकी आत्मा कल्पेगा..! “
हमने उसे खुला छोड़ दिया, ” जियो जी भर के “
जिस दिन बाप चल बसा,उसी दिन सुबह की बात है, मैं आफिस के लिए निकल रहा था। बाप भाई के ढाबे में सतू घोल रहा था। सुबह सुबह सतू घोल कर पीना भी उसके बरसों पुरानी आदतों में शामिल थीं। बहुतों बार मैंने भी सतू लाकर दिया था ‌। जैसे बचपन में मंगाने पर उसे दारू लाकर देता था।
लेकिन जबसे उसे यह मालूम हुआ कि बेटा दारू नहीं पीता है उल्टे दारू से नफ़रत करता है तो मुझसे दारू मंगाना उसने बंद कर दिया था।
हां, होली में और सोहराय परब में बियर लाने जरूर बोल देता था ” अरे, परब त्योहार में तो तोर हाथ से पिये दे..! ” मैं मना नहीं कर पाता था ‌। बेटा हूँ, कमाता हूँ तभी तो कहता है। मै सोचने लगता था।
दस सवा दस का वक्त हो रहा था। मैं एक जरूरी काम करने में लगा हुआ था कि तभी बड़े भतीजा का फोन आया ” गुंगू, ( बडे़ पापा) बाबा नहीं रहा…! “
” नहीं रहा..मतलब..? ” मैं चौंक उठा था । सवाल जवाब का समय नहीं था।
मैं काम समेट आफिस से जल्दी से भाग निकला ‌। घर पहुंचा बाबूजी को आंगन में एक खटिया पर लेटा पाया।
” यह कैसे हुआ..? ” कहना चाहा तो भाई आकर लिपट कर रोते हुए कहने लगा ” सतू पीकर घर से बाहर निकला और बांध की तरफ चला गया, एक घंटे तक जब वापस नहीं आया तो मैं उसे ढूंढने निकला। देखा ऊपर वाला खेतवा में अमा पेडवा के नीचे उतान पडल है, चप्पल दूर फेकाल है, देखकर ही हका बका हो उठा। विश्वनाथ को बांध तरफ से आते देखा । जल्दी से उसे बुलाया। दोनों मिल कर इसे घर ले लाया। डॉक्टर बुलाया। चेक किया। बोला ” मर चुका है..! “
भाई के साथ ही बाप रहता था ‌। इसका भी कारण था। मैं दारू नहीं पीता था और भाई सब कुछ पीता खाता था। पर बाप तो मेरा भी था। और वही मेरा बाप मर गया, मैं विश्वास नहीं कर पा रहा था। मन आहत था। शरद न बुखार, और न कोई दूसरी बर- बीमारी, कहीं करोना वेक्सीन का साइड इफेक्ट्स तो नहीं है यह ? बहुते हल्ला था इस तरह का पूरे क्षेत्र में !
यह मेरा वही बाप था जो कभी मुझे मरने के लिए कहता था, मेरे जन्म पर कोसता रहता था लेकिन तब हालात और घर की हालत भी कुछ वैसी ही थी। मेरा जीवित रहने का कोई आसार नहीं था।
जाने कौन घड़ी में मैं पैदा हुआ था कि बाप को दुश्मन के रूप में पाया । जन्म के बाद उसने कभी मुझे अपना बेटा नहीं समझा। हमेशा दोनों ने एक दूसरे को दुश्मन की नजर से देखा । दादी की माने तो जब मैं पैदा हुआ था गाँव में भंयकर रूप में सुखाड़ और अकाल पड़ा हुआ था ।
आज फिर मुझे अपना जन्म और जीवन याद आने लगा था ‌। किस तरह मेरा जन्म हुआ और किस तरह नया जीवन मिला, यह बात मैं सैंकड़ों बार अपनी आजि(दादी) की मुख से सुन चुका था । मेरे जन्म पर कैसी तो मातमी सूरत उतर आई थी पूरे घर-आंगन में ! मनुष्य पुत्र नहीं, मैं कोई मनहूस जैसा पैदा हो गया था ।
मेरा जन्म एक अभिशाप की तरह था । भीषण सुखाड़ और अकाल में जन्म लेना सबसे बड़ा गुनाह था मेरा । ऐसे में दूध की जगह पानी पी पी कर जी लेना बहुत बडी बात थी । मेरे जन्म से घर में कोई खुश नहीं था । आठ नौ माह अपनी कोख में ढोने वाली मां भी आश्वस्त नहीं हो पा रही थी कि उसका यह बेटा बचेगा भी ! बाप को तो मेरा मुंह देखना भी पसंद नहीं था । भूखे पेट के कारण मां की छाती से दूध की धार नहीं फूट पा रही थी। तब मैं गला फाड जोर से रोता तो मेरा यही बाप दांत पीसते हुए कहता था ” स्याला, अकाल की ढेंकी बन कर पैदा हुआ है,मर क्यों नहीं जाता ..!” रात भर वह कूढता रहता था । आज बाप मर गया और मैं उसके जैसा कुढ़ भी नहीं पा रहा हूँ कि, ” अच्छा हुआ बाप मर गया..! ” आखिर वो हमारा बाप था कोई दुश्मन नहीं। उधर,
” बिना दूध यह कितना दिन बच पायेगा..?” मेरे जन्म पर ऐसा मां सोचा करती थी । ऐसा सोचने के पीछे बड़ा कारण था ‌। घर में अनाज का दाना नहीं, खेत परती, कुओं से बाल्टियों की ढनढनाने की आवाज आती थीं । ऐसे में केवल मेरी दादी ही थी जो मुझे अपनी गोद में लिए दिन भर इधर-उधर घूमा करती थी। और मैं हवा पानी पीकर जी रहा था ” कुछ नहीं होगा मेरे सुगा को…!” ऐसी बोल दादी के मुंह से निकलते थे ।
अब न मुझे ” सुगा ” बोलने वाली दादी रही थी और न ” अकाल की ढेंकी ” कहने वाला बाप जिन्दा रहा। माँ की पहले ही आकाल मृत्यु हो चुकी थी ‌। मैंने एक घोषणा कर रखी थी कि अब इस घर में जो भी मरेंगे, उनको हम दफनायेंगे, उसे जलायेंगे नहीं। अब सामने हमारा बाप मरा पडा हुआ था। सो दफनाने और जलाने के नाम पर घर बंटवारे की तरह विचार भी बंट गए थे। एक पक्ष की राय थी जलाना चाहिए लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं था। आंगन में सभी आंख मूंदे खड़े थे जैसे। बेटी दामाद, नाती पोता सभी। मैंने भावुकता में कहना शुरू किया, ” बाप था हमारा, जला देंगे, हड्डी बहा देंगे, फिर कुछ सालों बाद उसे भूल जायेंगे, लेकिन यदि हम बाप को दफनाते है तो वहां उसका एक आदमकद मुर्ति बना देंगे तो बरसों लोग याद रखेंगे, अब आप लोग तय करें, हमें करना क्या है..? “
कुछ देर के लिए आंगन में सन्नाटा छा गया। कोई कुछ बोलने से बचते नज़र आए। तभी भाई आगे बढा था। बोला, ” दफनाना ठीक रहेगा। खेत के ऊपर टांड पर ठीक रहेगा। ” भाई ने जगह भी सुनिश्चित कर दिया। मेरा काम आसान हो गया था।
आज बाप का दस क्रम था। हित – कुटुबं, नये पुराने रिश्ते नाते सभी आ चुके थे। सिवाय मामा घर का छोड़कर ! वहां से खबर आई कि ” बिना तिवारी- बाभन का भोज काज शुद्ध नहीं होगा ऐसे भोज काज में हमें नहीं जाना है! “
बाप हमारा दारू दम भर पीता था, सिकार( मांस) भी सेर भर खा जाता था। लेकिन कभी बाभन को घर नहीं बुलाता था, पता नहीं किस बात की चिढ़ थी। फिर भी कोई अनचाहे आ जाता तो सीधे बोल उठता था “ लो, मुफतखोर आ गया..!” और घर से निकल जाता था।
बाप का भोज हमने अपने पुरखों की पारम्परिक रीति रिवाज कुडमालि नेगाचारी से किया । जिसमें बाभन और तिवारी का आना वर्जित रहता है । हां भोज में काफी संख्या में समाज के नामी गिरामी समाज कमिया लोग शामिल हुए । किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई थीं। सबने परम्परागत प्रथा का भरपूर गुणगान किये थे। बाद में महीनों दिन तक गाँव में इसी की चर्चा होती रही। तर्क और कुतर्क चलता रहा था।
लेकिन इसके बाद सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना वो पैंतालीस हज़ार रुपये जो दिवंगत बाप के हरका- बक्सा में पडे मिले थे- ग्यारहवें दिन में ! खोज खोज के बच्चों ने बाप के खजाने से निकाले थे वो पैंतालीस हज़ार रुपये..!
बाप का भोज काज समाप्त हो चुका था। हित- कुटुबं जा चुके थे। जो नहीं गए थे वो थे भंगिना- भंगिनी और बेटी- दामाद। सबसे पहले भंगिना बोला, ” नाना का खज़ाना खोला जाए, बहुत माल छिपा कर रखा होगा..! “
” बिलकुल खोला जाए..! ” बडा दामाद बोला।
भाई ने हरका- बक्सा की चाभी भंगिना के हाथ पकडा दिया।
और आंगन में उस वक्त जैसे मजमा लग गया था। सारे रूपये एक गमछा के ऊपर रख दिया गया था। इतने सारे रूपये बाप के बक्सा से निकले थे, ” पांच..दस..पन्द्रह..बीस.. पचीस.. तीस.. पैंतीस.. चालीस.. और.. पैंतालीस हज़ार सात सौ पचास रूपये…! ” सारे के सारे पांच सौ की नोट..! मैं हर माह पेंशन की तरह बाप को पांच सौ देता था ‌।
छोटे बड़े सभी नोटों की चर्चा कर रहे थे और मेरे कानों में बाप के कहे शब्द ताबड़तोड़ गूंजने लगा था, ” बेटा, मैं तुम्हारा दिया नहीं खाता, नहीं उडाता हूँ, जो भी तुम मुझे देता है सब रख देता हूँ मेरे मरने के बाद, सब मिल जायेगा, खोज लेना तब..! “
खड़े खड़े मेरी आँखों से कब दो बूंद नीचे गिर पड़े किसी को पता न चला था। इसी के साथ मै गली में आ गया था। कदम स्वत: उस दिशा में आगे बढ़ गया था जहां हमने बाप को अभी अभी दफनाया हुआ था…!

— श्यामल बिहारी महतो

*श्यामल बिहारी महतो

जन्म: पन्द्रह फरवरी उन्नीस सौ उन्हतर मुंगो ग्राम में बोकारो जिला झारखंड में शिक्षा:स्नातक प्रकाशन: बहेलियों के बीच कहानी संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तथा अन्य दो कहानी संग्रह बिजनेस और लतखोर प्रकाशित और कोयला का फूल उपन्यास प्रकाशित पांचवीं प्रेस में संप्रति: तारमी कोलियरी सीसीएल में कार्मिक विभाग में वरीय लिपिक स्पेशल ग्रेड पद पर कार्यरत और मजदूर यूनियन में सक्रिय

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