कविता -आशा की उर्वर भूमि
सफलता
किसी संयोग की देन नहीं,
वह उगती है
आशा की उर्वर भूमि पर।
आशा-
जो थाम लेती है
डगमगाते विश्वास का हाथ,
और कहती है,
चलो, अभी रास्ता बाकी है।
जीवन
दरअसल
आशा का ही प्रतिबिंब है,
जो भीतर जलती हुई
एक छोटी-सी लौ से
पूरा आकाश रोशन कर देता है।
जब हम
अपने गुणों पर भरोसा करते हैं,
आशा हमारे भीतर
जड़ें जमाने लगती है।
तब
शरीर की हर कोशिका
कर्म का गीत गाती है,
हर श्वास
एक नई शुरुआत बन जाती है।
सक्रियता,
परिश्रम,
और आगे बढ़ने की इच्छा—
ये सब
आशावाद की संतानें हैं।
जितना बढ़ता है उत्साह,
उतनी ही विस्तृत होती है
हमारी कार्यक्षमता।
और उसी अनुपात में
स्वयं पर विश्वास
एक वृक्ष की तरह
फैलाता जाता है
अपनी हरियाली।
इसलिए
आशावादी बने रहना
सिर्फ़ एक विचार नहीं,
जीवन को
हर दिन
नई संभावना के साथ
जीने की कला है।
— महेश कुमार कुलदीप
