कविता – जब तुम उतरते हो
जब तुम उतरते हो
मेरे भीतर,
उतर आता है आकाश
उतर आती है धरती
और
बिखर जाता है – इंद्रधनुष।
महकने लगता है मुझमें –
फागुन।
तब मैं मैं नहीं रहता;
हो जाता हूँ –
मोर का नृत्य,
कोयल की कूक,
महकता पुष्प।
— महेश कुमार कुलदीप
जब तुम उतरते हो
मेरे भीतर,
उतर आता है आकाश
उतर आती है धरती
और
बिखर जाता है – इंद्रधनुष।
महकने लगता है मुझमें –
फागुन।
तब मैं मैं नहीं रहता;
हो जाता हूँ –
मोर का नृत्य,
कोयल की कूक,
महकता पुष्प।
— महेश कुमार कुलदीप