ग़ज़ल
तसव्वुरात की दुनिया जो है ख़्याली है
मगर ग़ज़ल के लिए ये ज़मीं निराली है
घने दरख़्त हैं सब्ज़ा है,खेत झरने हैं
तमाम दुनिया में देश अपना ही मिसाली है
हमारे दौर के इंसान, बन गए भगवान
इन्होंने उल्टी ही गंगा यहां बहाली है
कभी अकेले में जब याद आ गई उसकी
तो देखने को ये गर्दन ज़रा झुकाली है
तेरे करम की नज़र हो, इधर भी ए मालिक
बहुत दिनों से “नमिता” तेरी सवाली है
— नमिता राकेश
