पीढ़ी अंतराल – एक खामोश दीवार
पीढ़ी अंतराल सिर्फ उम्र का फासला नहीं, सोचने के तरीके का फासला है। हमारे दादा-दादी ने दुनिया को रेडियो पर सुना, माता-पिता ने टीवी पर देखा, और हम उसे मुट्ठी में लेकर घूम रहे हैं। जब अनुभव की गति अलग-अलग हो, तो टकराव स्वाभाविक है।
यह अंतराल क्यों बढ़ता है?
1. तकनीक: बुजुर्गों के लिए तकनीक एक औजार है, नई पीढ़ी के लिए साँस लेने जैसी आदत। एक पक्ष कहता है “फोन रखो”, दूसरा कहता है “फोन में ही तो दुनिया है।”
2. मूल्य और स्वतंत्रता: पुरानी पीढ़ी के लिए सुरक्षा का अर्थ है – स्थायी नौकरी, जल्दी शादी, समाज की स्वीकृति। नई पीढ़ी के लिए सुरक्षा का अर्थ है – मानसिक शांति, अपने फैसले लेने की आजादी, और खुद को खोजना।
3. संवाद की कमी: पहले बातें आंगन में होती थीं। अब हर कोई अपने कमरे और अपनी स्क्रीन में है। हम एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में जीते हैं।
दीवार को पुल कैसे बनाएँ?
इसका हल न तो जीत है, न हार। हल है सुनना।
बड़ों को यह समझना होगा कि हर सवाल बगावत नहीं होता, कई सवाल समझने की कोशिश होते हैं। और छोटों को यह समझना होगा कि हर रोक-टोक पाबंदी नहीं होती, कई बार वह अनुभव से निकली चिंता होती है।
पीढ़ी अंतराल को मिटाना नहीं है, उसे पाटना है। जैसे पुराने पेड़ की जड़ें और नई कोपलें एक ही तने से जुड़ी हैं, वैसे ही हमें भी जुड़े रहना है।
जड़ कहती है – टिके रहो।
कोपल कहती है – बढ़ते रहो।
और जीवन कहता है – दोनों जरूरी हैं।
— डॉ ओम मधुब्रत
