प्याज के भाव सातवें आसमान पर
प्याज की बढ़ती कीमतों से उपभोगताओं को राहत देने के लिए सरकार ने दिल्ली समेत देश के 19 शहरों में बफर स्टाक की आपूर्ति तेज कर दी।कांदा एक्सप्रेस के जरिये हर राशनकार्ड पर एक किलो प्याज बांटने की योजना से उपभोक्तओं को प्याज मिल सकें।ऐसी योजना की पहल कमी को देखते हुए सही है।अक्सर देखा गया कि प्याज,टमाटर में ही उछाल आता है।जिससे व्यापार क्षेत्र में हलचल खड़ी हो जाती है।शहरों के अलावा गांवों में भी प्याज की आपूर्ति होना चाहिए।ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को कम दर का प्याज प्राप्त हो सके।उल्लेखनीय है कि लाल प्याज को छोड़कर सफेद प्याज बहुत कम बाजारों में दिखता है।प्याज की फसल का क्षेत्र खेतों में बढाया जाए।ताकि प्याज की कमी को दूर किया जा सकें।वर्तमान में
प्याज के भाव सातवे आसमान पर जा पहुंचे साथ ही प्याज की कमी भी बाजारों में दिखाई देने लगी| क्योकि पेपर में भी सब्जियों के भाव आने लगे। भाव को व्यापारी पेपर पढ़ते। उसको पढ़कर भाव लगाते।पहले भी प्याज के भाव आसमान पर हो गए कि लोग कहने लगे कि ‘कुछ ज्यादा ही भाव खा रिया है’ पहले गर्मी में यदि नकोली (नकसीर) होती तो उपचार स्वरूप प्याज फोड़ के सुंघाया जाता।लू लगने के डर से लोग जेब मे प्याज भी रखते थे।अब क्या रखे लगभग खुल्ला प्याज ही महंगा पड़ रहा है।ग्रेवी में डाले जाने वाला प्याज न डाले जाने से ग्रेवी का स्वाद बेस्वाद हुआ जा रहा था ।पोहे में ऊपर से प्याज की जगह मूली को उपयोग में लिया जा रहा।किन्तु प्याज की बात ही कुछ और है।मुक्के से फोड़ कर प्याज खाने वाले परेशान उन्हें चाकू से कतरे हुए प्याज की एक रिप वो भी मांगने पर मिलती थी।पियक्कड़ों को शाम को मयखाने में प्याज चखने में नही मिल रहे। पियक्कड़ उदास हो रहे।सब्जी भाजी में प्याज की पकड़ मजबूत है।प्याज के बिना सब्जियों के स्वाद की लोग बाग झूठी तारीफ करते है।एक समय तो प्याज के भाव का रुतबा औऱ रिकार्ड ने तो सेवफल को पीछे छोड़ दिया है।पहले प्याज खाते तो लोग बाग माउथ फ्रेशनर का उपयोग करते ताकि प्याज की बदबू नहीं आए।किन्तु जब भाव बढे तब प्याज लिया वो सबसे ज्यादा धनवान। प्याज के छिलके उतारने की कहावत अब महंगी होगई थी ।प्याज लाते तो अब बच्चें आसपास इकट्ठे होकर बड़े खुश होते और जोर से मम्मी को आवाज लगाते।मम्मी देखों पापा प्याज लाए।घर मे उत्सव का माहौल बन जाने लगा।प्याज महंगा होने से।प्याज का घरों में इज्जत औऱ ओहदा बढ़ गया।कभी प्याज – आँगन ,छत पर धूप खाने इधर उधर बिखरे पड़े रहते थे
कुछ लोग प्याज नही खाते ।यदि कोई भूल से प्याज नही लाए तो पड़ोसी से मांग लेते थे।जिस प्रकार बाढ़ के पानी का स्तर बढ़ता उसी प्रकार प्याज का भाव भी बढ़ता जा रहा।प्याज कतरने पर आँसू आते थे।अब भाव सुनकर सब रोने लगे।कही ऐसा ना हो फ़िल्म निर्माताओ को पटकथा ना मिले तो ये प्याज की पटकथा तैयार कर प्याज पर फिल्मांकन कर प्रदर्शित कर सकते है।।दुसरो को स्टोरी सुनाने के साथ का आनंद भी बता सकते है।महंगे होने से घरों में बिन पूछे यदि प्याज उठा लिया तो ग्रह युद्ध छिड़ जाता है।भले ही आप कमाकर लाते हो ।हुकूमत तो पत्नी की ही चलती है। क्या वाकई जिंदगी प्याज बिना अधूरी है?शायद स्वाद के रसिको के स्वर एक साथ उठेंगे -हाँ भई हाँ।
मंचीय कार्यक्रम -कवि सम्मेलन , साहित्य और अन्य कार्यक्रम में टमाटर प्याज महंगे होने से मंच पर फेके नही जा रहे थे। हर कोई अपनी प्रतिभा घर में ही दिखा रहा है। मोबाइल पर ऑनलाइन कवि सम्मेलन ,ज्ञानार्जन की बातें शेयर की जा रही है। जब कवि की कविता सुनाने का मोबाइल के हिसाब से नंबर आया तो उनके कानों में बाहर ठेले वाला जिसके पास सब्जी बेचने का ठेला था वो आवाज लगा रहा था।प्याज ले लो।कवि की प्याजर लिखी कविता का बाहर से और कवि की अंतरात्मा से जबरदस्त समर्थन मिल रहा था।बस अब महंगे प्याज होने से सुनने वालों की वाह वाह नहीं निकल रही थी। जबकि अब अन्य सब्जियां भी प्याज के समर्थन में भाव खाने लगी।वाकई महंगे प्याज ने उपभोक्ताओं की आंखों में आंसू ला दिए बिना प्याज को काटे।
— संजय वर्मा दृष्टि’
