प्रकृति का अनुपम आंचल
प्रकृति का यह मोहक रूप,
लगता है सबसे अनूप,
पल-पल रंग बदलती काया,
कभी छांव है,कभी है धूप,
कल-कल करती नदियों की धार,
बहती जाती है हर पार,
बिना भेद के,बिना रुके ही,
देती सबको खुल के प्यार,
हरे-भरे ये सुंदर खेत,
नदियों के पावन ये रेत,
पर्वत शीश उठाए खड़े हैं,
जैसे देते पहरा नेक,
शीतल मंद हवा का चलना,
कलियों का धीरे से खिलना,
सुबह-सवेरे सूरज की लाली,
शाम को चंदा का मिलना,
पंछी गाते मीठे गान,
बढ़ाते इस उपवन की शान,
झरनों से झरता मधुर संगीत,
कर देता हर मन को हैरान,
इसकी गोद में जो भी आता,
अपने सारे दुःख भूल जाता,
यह निस्वार्थ भाव से सबको,
जीवन का सच्चा पाठ सिखाता,
आओ इनसे जुड़ो यार,
धरा का यह अनुपम श्रृंगार।
— राजेन्द्र लाहिरी
