कर्मफल
“मंथर गति से बहती जीवनदायिनी नदियाँ इतनी आक्रामक क्यों हैं? जिनके तीर पर उद्विग्न मन भी शांत हो जाता था, उनका विकराल स्वरूप देख हृदय काँप उठता है। नदियाँ अपनी हद को तिरस्कृत करती घरों में क्यों घुसी चली आ रही हैं?” बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र की नयना के स्वरों में शंका मिश्रित चिंता उभरी।
बाढ़ में डूबे घर में पलंग पर बैठे पिता ने उत्तर दिया, “दोष नदियों का नहीं है, इंसानों का है। प्रकृति, पहाड़-पठार, नदियाँ, जंगल, झील, झरने मानव जीवन को सहज बनाने हेतु ईश्वरीय वरदान थे। पर सहज उपलब्ध वस्तुओं की कीमत कहाँ थी इंसान को! स्वार्थ सिद्धि हेतु इनका अंधाधुंध दोहन करना शुरू कर दिया, इन्हें सिर्फ व्यवसायिक नजरिए से देखा। अपनी बदनीयती में इनसे छेड़छाड़ शुरू की, बर्फ से सुसज्जित पहाड़ों पर गंदगी फैलाई, जंगल काट कर वीराना बना दिया, नदियों के रुख मोड़े, उनमें निकृष्टतम गंदगी प्रवाहित की, प्लास्टिक के कचरे से प्रकृति के हर स्वरूप को दूषित कर रही सही कसर भी निकाल ली। परिणाम – ग्लोबल वार्मिंग से पिघलते ग्लेशियरों से पहाड़ी क्षेत्रों का जल संतुलन बिगड़ गया, नदियों में जल की बेहिसाब बढ़ोतरी हुई, नैसर्गिक बहाव में छेड़छाड़ से नदियाँ गाद से उथली हो चुकी हैं, तभी वे खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। पानी को तो घरों मोहल्ले में घुसना ही है। कर्मफल से कोई नहीं बचता।”
नयना रिक्त निगाहों से बाढ़ के अंतहीन मटमैले जल की ओर देखती रही।
— नीना सिन्हा
