राजनीति

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता का समय

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, नागरिक अधिकारों और विधि के शासन की अंतिम संरक्षक भी है। इसलिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानी जाती है। किंतु स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर उठने वाले प्रश्न यह संकेत देते हैं कि न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच एक संतुलित व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। यह बहस किसी संस्था को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को और सुदृढ़ करने की है।

भारत में उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों की वर्तमान महाविद्यालय व्यवस्था संविधान में प्रत्यक्ष रूप से वर्णित नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है। इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखना था। यह चिंता उचित भी थी, क्योंकि न्यायपालिका की निष्पक्षता तभी सुरक्षित रह सकती है जब न्यायाधीश सत्ता के दबाव से स्वतंत्र होकर निर्णय लेने में सक्षम हों। किंतु तीन दशकों से अधिक समय के अनुभव ने यह भी स्पष्ट किया है कि राजनीतिक हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखने वाली व्यवस्था को संस्थागत उत्तरदायित्व से पूरी तरह मुक्त नहीं रखा जा सकता।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि न्यायाधीशों के चयन की कसौटियां क्या हैं और उनका मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है। न्यायिक नियुक्तियां सामान्य सरकारी भर्ती की तरह नहीं हो सकतीं। न्यायाधीश बनने के लिए केवल विधिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। संवैधानिक समझ, स्वतंत्र चिंतन, सत्यनिष्ठा, न्यायिक दृष्टि, मानवीय संवेदनशीलता और निष्पक्ष निर्णय क्षमता जैसे गुण भी उतने ही आवश्यक हैं। इन गुणों का मूल्यांकन परीक्षा या अंकों से नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि चयन प्रक्रिया के पीछे कोई स्पष्ट और समझने योग्य ढांचा ही न हो।

पारदर्शिता का अर्थ प्रत्येक उम्मीदवार की निजी जानकारी को सार्वजनिक करना नहीं है। न्यायिक नियुक्तियों में गोपनीय जांच और संवेदनशील सूचनाओं की रक्षा आवश्यक है। किंतु गोपनीयता और निर्णय के औचित्य में अंतर है। किसी उम्मीदवार का चयन किन व्यापक मानकों के आधार पर हुआ, उसे अन्य संभावित उम्मीदवारों की तुलना में क्यों उपयुक्त माना गया और चयन की प्रक्रिया किन सिद्धांतों से संचालित हुई—इतनी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। इससे गोपनीयता भी बनी रहती है और संस्थागत विश्वास भी मजबूत होता है।

न्यायिक नियुक्तियों में पारिवारिक संबंधों को लेकर उठने वाले प्रश्न भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। किसी न्यायाधीश या वरिष्ठ अधिवक्ता के परिवार से आने वाला व्यक्ति केवल इस कारण अयोग्य नहीं माना जा सकता कि उसका पारिवारिक संबंध न्यायिक क्षेत्र से है। यदि वह योग्य है, उसका पेशेवर अनुभव उत्कृष्ट है और उसमें न्यायिक दायित्व निभाने की क्षमता है, तो उसे अवसर मिलना चाहिए। समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह स्पष्ट नहीं होता कि उसकी स्वतंत्र योग्यता का मूल्यांकन किस प्रकार किया गया। चयन प्रक्रिया जितनी अस्पष्ट होगी, संदेह उतना अधिक बढ़ेगा।

इसलिए आवश्यकता पारिवारिक संबंधों पर प्रतिबंध लगाने की नहीं, बल्कि हित-संघर्ष से बचने के स्पष्ट नियम बनाने की है। यदि किसी उम्मीदवार का किसी वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश से निकट संबंध है, तो उस तथ्य को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जा सकता है। संभावित हित-संघर्ष की स्थिति में संबंधित सदस्य को निर्णय प्रक्रिया से अलग रखने जैसे उपाय भी किए जा सकते हैं। इससे निष्पक्षता की धारणा मजबूत होगी और योग्य उम्मीदवारों के प्रति भी न्याय सुनिश्चित होगा।

न्यायपालिका स्वयं अनेक अवसरों पर सार्वजनिक संस्थाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित करती रही है। संविधान समानता और अवसर की समानता का सिद्धांत स्थापित करता है। न्यायिक नियुक्तियां भले ही पारंपरिक भर्ती प्रक्रिया न हों, लेकिन सार्वजनिक पदों से संबंधित होने के कारण उनमें संवैधानिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है। यदि प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों को यह विश्वास हो कि चयन की प्रक्रिया स्पष्ट और निष्पक्ष है, तो न्यायपालिका की नैतिक शक्ति और अधिक बढ़ेगी।

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न महाविद्यालय के निर्णयों के कारणों से जुड़ा है। केवल नाम घोषित कर देना पर्याप्त पारदर्शिता नहीं माना जा सकता। निर्णय के पीछे मौजूद व्यापक तर्क भी महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किसी उम्मीदवार को उसकी विधिक विशेषज्ञता, संवैधानिक समझ, न्यायिक अनुभव या पेशेवर प्रतिष्ठा के कारण चुना गया है, तो इन कारणों का संक्षिप्त उल्लेख किया जा सकता है। इससे संस्था की विश्वसनीयता बढ़ती है और अनावश्यक अटकलों की संभावना कम होती है।

यहां न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों को भी संतुलित दृष्टि से समझना होगा। न्यायिक नियुक्तियों को पूरी तरह कार्यपालिका के अधीन कर देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे राजनीतिक प्रभाव का खतरा उत्पन्न हो सकता है। दूसरी ओर, नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया यदि केवल न्यायपालिका के भीतर सीमित रहे तो बाहरी उत्तरदायित्व का अभाव भी प्रश्न खड़े कर सकता है। इसलिए आवश्यकता किसी एक संस्था को अधिक शक्तिशाली बनाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व दोनों का संतुलन बना रहे।

दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में न्यायिक नियुक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न व्यवस्थाएं अपनाई गई हैं। कहीं स्वतंत्र आयोग की भूमिका है, कहीं संरचित साक्षात्कार की व्यवस्था है और कहीं सार्वजनिक आवेदन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। भारत के लिए किसी विदेशी मॉडल की प्रतिलिपि बनाना आवश्यक नहीं है, किंतु यह समझना महत्वपूर्ण है कि न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता एक-दूसरे की विरोधी अवधारणाएं नहीं हैं।

भारत में सुधार की शुरुआत एक स्पष्ट चयन-ढांचा तैयार करने से हो सकती है। इसमें अनुभव, सत्यनिष्ठा, विधिक क्षमता, संवैधानिक समझ, विविधता और पेशेवर प्रतिष्ठा जैसे मानकों को व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया जा सकता है। इससे चयन प्रक्रिया पूरी तरह यांत्रिक नहीं होगी, लेकिन उसके लिए एक संस्थागत आधार अवश्य निर्मित होगा।

पारदर्शिता के साथ नियुक्तियों की समयबद्धता भी महत्वपूर्ण है। न्यायालयों में रिक्त पदों की बड़ी संख्या न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है। लंबित मामलों का बढ़ता बोझ नागरिकों के लिए न्याय को कठिन और विलंबित बनाता है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाना भी उतना ही आवश्यक है जितना उसे पारदर्शी बनाना।

आज सामाजिक माध्यमों के युग में न्यायिक नियुक्तियों से जुड़ी सूचनाएं तुरंत सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाती हैं। ऐसे समय में संस्थागत चुप्पी कई बार संदेह को जन्म देती है। सीमित लेकिन तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराना संस्था की गरिमा को कम नहीं करता, बल्कि उसे अधिक विश्वसनीय बनाता है। लोकतंत्र में सार्वजनिक विश्वास केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि उन अधिकारों के उत्तरदायी प्रयोग से निर्मित होता है।

यह भी समझना होगा कि न्यायपालिका की आलोचना उसकी स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं है। स्वतंत्रता का अर्थ आलोचना से मुक्ति नहीं, बल्कि बाहरी दबाव से स्वतंत्रता है। लोकतंत्र में नागरिकों और विधि विशेषज्ञों को संस्थाओं से प्रश्न पूछने का अधिकार है। उसी प्रकार संस्थाओं की भी यह जिम्मेदारी है कि वे अपने निर्णयों के पीछे मौजूद सिद्धांतों को स्पष्ट करें।

अंततः बहस महाविद्यालय व्यवस्था को समाप्त करने या बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे अधिक विश्वसनीय, निष्पक्ष और उत्तरदायी बनाने की है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु स्वतंत्रता और पारदर्शिता को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। स्पष्ट नियम, कारणयुक्त निर्णय, हित-संघर्ष से बचाव और समयबद्ध नियुक्तियां न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को और मजबूत कर सकती हैं।

समय की मांग है कि न्यायिक नियुक्तियों में गोपनीयता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। योग्यता सर्वोच्च कसौटी बने, संबंध विशेषाधिकार में न बदलें और चयन प्रक्रिया पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो। न्यायपालिका की शक्ति केवल उसके संवैधानिक अधिकारों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में निहित है। यही विश्वास उसकी वास्तविक वैधता का आधार है, और पारदर्शिता उस विश्वास को सुदृढ़ करने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।

— अवनीश कुमार गुप्ता

अवनीश कुमार गुप्ता

साहित्यकार, स्वतंत्र स्तंभकार, समीक्षक एवं पुस्तकालयाध्यक्ष पता: प्रयागराज 211008, उत्तर प्रदेश मोबाइल: 8354872602 ईमेल: awanishg30@gmail.com

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