विज्ञान

महान भारतीय भौतिक विज्ञानी: एनाकल चैंडी जार्ज सुदर्शन 

भारतीय विज्ञान-जगत में कुछ ऐसे वैज्ञानिक हुए हैं, जिनका योगदान किसी एक खोज या एक विषय तक सीमित नहीं रहा। एनाकल चैंडी जॉर्ज (एसीजे) सुदर्शन ऐसे ही विलक्षण सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी थे, जिन्होंने कण भौतिकी, क्वांटम प्रकाशिकी, क्वांटम यांत्रिकी और क्वांटम सूचना-विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनकी वैज्ञानिक यात्रा यह प्रमाणित करती है कि प्रयोगशाला में उपकरणों के साथ काम करने के अतिरिक्त गणितीय चिंतन, मौलिक प्रश्न पूछने की क्षमता और स्थापित धारणाओं की गहराई से जाँच भी विज्ञान की प्रगति के लिए उतनी ही आवश्यक है।

सुदर्शन का जन्म 16 सितंबर 1931 को केरल के कोट्टायम क्षेत्र के पल्लम में हुआ था। उनका निधन 13 मई 2018 को आस्टिन, टेक्सास, अमेरिका में 86 वर्ष की आयु में हुआ। वे लंबे समय तक अमेरिका में कार्यरत रहे, लेकिन भारत के वैज्ञानिक संस्थानों और विद्यार्थियों से उनका संबंध जीवनभर बना रहा। 

शिक्षा 

सुदर्शन की प्रारंभिक शिक्षा केरल में हुई। उन्होंने सीएमएस कालेज, कोट्टायम में अध्ययन किया और आगे मद्रास क्रिश्चियन कालेज, ताम्ब्रम  से 1951 में भौतिकी में बीएससी (आनर्स) किया। इसके बाद उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से 1952 में एमए की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा के दौरान ही उनकी रुचि सैद्धांतिक भौतिकी, गणित और क्वांटम यांत्रिकी की ओर गहरी हो गई थी। 

1952 में वे टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर ), मुंबई से जुड़े। उस समय भारत में आधुनिक परमाणु एवं कण भौतिकी के विकास में टीआईएफआर  की महत्वपूर्ण भूमिका थी और होमी जहांगीर भाभा इसके निर्माण तथा विकास के प्रमुख वैज्ञानिकों में थे। टीआईएफआर में सुदर्शन ने कॉस्मिक-रे कणों और परमाणु-कण संबंधी अनुसंधान पर काम किया। इसी काल में उनकी प्रतिभा पर विख्यात भौतिक विज्ञानी रॉबर्ट मार्शक की नजर पड़ी और उन्होंने सुदर्शन को अमेरिका के रोचेस्टर यूनिवर्सिटी में शोध के लिए आमंत्रित किया। 

1955 में वे रोचेस्टर पहुँचे और वहाँ राबर्ट मार्शक के निर्देशन में शोध किया। मात्र कुछ वर्षों में उन्होंने ऐसी वैज्ञानिक समस्याओं पर काम किया जो उस समय कण भौतिकी के केंद्र में थीं। उन्हें 1958 में रोचेस्टर विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय  में प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जूलियन श्विंगर के साथ पोस्टडाक्टोरल की। 

वी – ए सिद्धांत (V-A) :

सुदर्शन के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदानों में V-A (Vector minus Axial Vector) कमजोर नाभिकीय अंतःक्रिया सिद्धांत (theory of weak interaction) प्रमुख है। कमजोर नाभिकीय अंतःक्रिया प्रकृति की मूलभूत अंतःक्रियाओं में से एक है और रेडियोधर्मी बीटा क्षय जैसी प्रक्रियाओं को समझने में इसका विशेष महत्व है।

सुदर्शन और उनके शोध-निर्देशक राबर्ट मार्शक ने कमजोर अंतःक्रिया के लिए V-A संरचना विकसित की। इस सिद्धांत ने बाद में विकसित हुई इल्क्ट्रोवीक थ्योरी की नींव तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। टेक्सास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इतिहास संबंधी विवरण में भी V-A सिद्धांत को सुदर्शन की प्रमुख उपलब्धियों में गिना गया है और इसे कमजोर तथा विद्युतचुंबकीय अंतःक्रियाओं के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। 

 सुदर्शन का योगदान अपने आप में किसी अंतिम ‘एकीकृत सिद्धांत’ के रूप में नहीं था, बल्कि कमजोर अंतःक्रिया की प्रकृति को समझने वाली उस सैद्धांतिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा था, जिस पर आगे इल्क्ट्रोवीक थ्योरी  विकसित हुई। इसलिए उन्हें आधुनिक कण भौतिकी के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है।

क्वांटम प्रकाशिकी में क्रांतिकारी योगदान

सुदर्शन का दूसरा अत्यंत प्रभावशाली क्षेत्र था—Quantum Optics अर्थात क्वांटम प्रकाशिकी।

शास्त्रीय भौतिकी में प्रकाश को विद्युतचुंबकीय तरंग के रूप में समझाया जाता है, जबकि क्वांटम सिद्धांत में प्रकाश को फोटान जैसे क्वांटम के रूप में भी समझना पड़ता है। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संबंध को गणितीय रूप से समझना आधुनिक प्रकाशिकी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती थी।

सुदर्शन ने आप्टिकल इक्यूवैलेंस थ्योरम(Optical Equivalence Theorem) तथा प्रकाश की क्वांटम अवस्थाओं के वर्णन के लिए प्रसिद्ध सुदर्शन – ग्लाउबर पी रिप्रेजेंटेशन थ्योरी (Sudarshan representation/P-representation) विकसित की। इस कार्य ने क्वांटम और शास्त्रीय प्रकाश-वर्णन के बीच संबंध को समझने के लिए शक्तिशाली गणितीय ढाँचा प्रदान किया। आधुनिक क्वांटम आप्टिक्स के विकास में इसे आधारभूत कार्यों में गिना जाता है। 

इस योगदान का महत्व आज और भी स्पष्ट दिखाई देता है क्योंकि क्वांटम प्रकाशिकी केवल सैद्धांतिक विषय नहीं रह गई है। लेजर, क्वांटम संचार, क्वांटम मापन और क्वांटम सूचना जैसे क्षेत्रों में प्रकाश की क्वांटम प्रकृति को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

टैकीआन का सिद्धांत 

सुदर्शन ने प्रकाश से भी तेज गति वाले काल्पनिक कणों की परिकल्पना की, जिन्हें टैकीआन नाम दिया। फोटो में भी सुदर्शन के जिस योगदान को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है, वह है टैकीआन (Tachyon) की परिकल्पना।सुदर्शन और उनके शोधार्थी वी. के. देशपांडे ने इस विचार पर काम किया। 

यहाँ यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि टैकीआन  का आज तक कोई प्रयोगात्मक प्रमाण नहीं मिला है। अतः इसे खोजे जा चुके वास्तविक कण के रूप में प्रस्तुत करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। यह एक सैद्धांतिक अवधारणा है, जिसने सापेक्षता, कारणता और कणों की गति की सीमाओं पर विचार करने के लिए भौतिकविदों को प्रेरित किया। 

यही सुदर्शन की वैज्ञानिक दृष्टि की विशेषता थी।वे उन प्रश्नों पर भी विचार करते थे जिनका तत्काल प्रयोगात्मक उत्तर उपलब्ध नहीं था।

क्वांटम जीनो प्रभाव और अन्य अनुसंधान

सुदर्शन का वैज्ञानिक योगदान V-A सिद्धांत और क्वांटम प्रकाशिकी तक सीमित नहीं था। उन्होंने क्वांटम जीनो प्रभाव (Quantum Zeno Effect) पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया। इस प्रभाव का संबंध इस बात से है कि किसी क्वांटम प्रणाली को बार-बार मापने से उसके विकास की प्रकृति किस प्रकार प्रभावित हो सकती है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने ओपन क्वांटम सिस्टम , क्वांटम डायनेमिक्स, सममिति (symmetry), क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत (quantum field theory) तथा स्पिन-सांख्यिकी संबंधी प्रश्नों पर भी महत्वपूर्ण अनुसंधान किया। उनके शोध का विस्तार इतना व्यापक था कि आधुनिक सैद्धांतिक भौतिकी के कई अलग-अलग क्षेत्रों में उनका नाम मिलता है। 

उनके दीर्घ वैज्ञानिक जीवन में सैकड़ों शोध-पत्र प्रकाशित हुए और उन्होंने विद्यार्थियों तथा युवा शोधकर्ताओं की कई पीढ़ियों को प्रशिक्षित किया।टेक्सास विश्वविद्यालय के अभिलेखीय विवरण में उन्हें लंबे समय तक अध्यापन और अनुसंधान से जुड़े ऐसे वैज्ञानिक के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने अमेरिका के साथ-साथ भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। 

भारत से संबंध और संस्थान निर्माण

विदेश में लंबे समय तक रहने के बावजूद सुदर्शन का भारत से संबंध कमजोर नहीं हुआ। वे इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, बेंगलुरू  (IISc), Bengaluru में Center for Theoretical Studies से जुड़े रहे और बाद में इंस्टीट्यूट आफ मैथमेटिकल साइंस (IMSc), चेन्नई के निदेशक भी रहे। इससे स्पष्ट होता है कि वे केवल व्यक्तिगत शोध तक सीमित वैज्ञानिक नहीं थे; वे भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की संस्थागत संस्कृति को मजबूत करने में भी रुचि रखते थे। 

सम्मान और पुरस्कार

सुदर्शन को भारत तथा विदेशों में अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले। प्रमुख सम्मानों में सम्मिलित हैं—

सी. वी. रमन एवार्ड — 1970

पद्मभूषण  — 1976

बोस मेडल  — 1977

टीडब्ल्यूएएस(TWAS) भौतिकी पुरस्कार  — 1985

मेजोराना पुरस्कार  — 2006

पद्मविभूषण  — 2007

डिराक मेडल , ICTP — 2010

केरला सस्त्र पुरस्कारम्— 2013

उनका नाम नोबेल पुरस्कार के संदर्भ में भी अनेक बार चर्चा में रहा है, किंतु नोबेल पुरस्कार न मिलने से उनके स्थापित वैज्ञानिक योगदान का महत्व कम नहीं होता। उनकी कहानी इस बात का भी उदाहरण है कि विज्ञान में किसी सिद्धांत का महत्व केवल उसके तत्काल उपयोग से निर्धारित नहीं होता। कोई गणितीय विचार दशकों बाद विकसित होती तकनीक के लिए आधार बन सकता है। इसी कारण सुदर्शन का काम आज भी भौतिकी के इतिहास और आधुनिक क्वांटम विज्ञान दोनों में प्रासंगिक है।

अस्तु, एनाकल चैंडी जार्ज सुदर्शन भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा के उन प्रतिनिधि नामों में हैं, जिन्होंने विश्व विज्ञान में स्थायी छाप छोड़ी। सुदर्शन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि वैज्ञानिक प्रगति केवल तैयार उत्तर खोजने से नहीं होती; वह सही प्रश्न पूछने, जटिल समस्या को नए दृष्टिकोण से देखने और प्रमाण मिलने तक विचार को लगातार परखने से होती है। उनकी जीवन-यात्रा भारतीय युवाओं को यह विश्वास देती है कि सीमित संसाधनों से आरंभ हुई जिज्ञासा भी विश्वस्तरीय वैज्ञानिक चिंतन का रूप ले सकती है—यदि उसके साथ अध्ययन, अनुशासन, गणितीय क्षमता और मौलिक सोच जुड़ी हो।

महान भारतीय वैज्ञानिक एसीजे सुदर्शन को विज्ञान जगत में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए सदैव सम्मान के साथ याद किया जाता रहेगा। 

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र 

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर लखनऊ 226022 दूरभाष 09956087585