कविता

स्याही का सफ़र

की थी एक दिन नई शुरुआत,
कुछ टूटे-फूटे शब्दों के साथ,
भावों का समंदर उफन रहा था,
मन कुछ लिखने को कह रहा था ।

जानती न थी लेखन की दिशा,
प्रेरणा मिली दूर करने को निशा,
धन्यवाद को ही सर्वप्रथम चुना,
अभिव्यक्ति स्वरूप कुछ बुना ।

हृदय का भाव था मंगल कामना,
मन ने आत्मा की आवाज को सुना,
निकल पड़े यूॅं ही स्याही के सफर पर,
थोड़ा सहमें हुए बढ़े धीरे-धीरे चलकर ।

वो भेजता गया अपने फरिश्तों को,
साथ लिए दुआओं की पोटली को,
कई उतार-चढ़ाव बीच में आते गए,
उदासी-मुस्कुराहट संग लिए सीखते गए ।

गुरु कृपा का अमृत पान किया,
अंतःकरण को चिंता मुक्त किया,
बस अब जो प्रभु लिखवाता है,
उसी का नाम ले लिख देते हैं ।

अंत तक जारी रहेगा अंजाना,
स्याही का “आनंद” सफ़र सुहाना,
ये जीवन प्रभु का ही प्रताप है,
दूर किया उसने सारा विलाप है ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु