हलवे का जलवा
छोटे-से शिवम के लिए उसके पापा बहुत-से खिलौने ले आए. उनमें एक खिलौना था- बापू के तीन बंदर.
एक बंदर की आंखें बंद थीं, दूसरे के कान और तीसरे का मुँह. उसे वह खिलौना बड़ा अजीब-सा लगा.
“ये कैसा खिलौना ले आए पापा, मेरे तो किसी भी दोस्त के पास ऐसा खिलौना नहीं है!” शिवम नाराज-सा था.
“तुम्हारे किसी भी दोस्त के पास ऐसा खिलौना नहीं है, तभी तो लाया हूँ! यह खिलौना महात्मा गांधी के पास था.”
“इसकी क्या खासियत है?” अब शिवम की जिज्ञासा मुखर थी.
“जिस बंदर की आंखें बंद हैं, वह सिखाता है कि “बुरा मत देखो”, जिस बंदर के कान बंद हैं, वह सिखाता है कि “बुरा मत सुनो” और जिस बंदर ने मुँह पर हाथ रखे हुए हैं, वह सिखाता है कि “बुरा मत बोलो”. है न मजेदार और प्रेरणादायक खिलौना!” पापा को प्रेरणादायक बात बनती दिखी.
“सारा दिन मोबाइल से खेलना गंदी बात है.” माँ ने कहा तो शिवम ने कान बंद कर लिए.
माँ को उसका सुना-अनसुना करना बड़ा अजीब-सा लगा.
“शिवम, फिर तुम गंदा वीडियो देख रहे हो!” शाम को पापा ने कहा.
“पापा, जब तक देखूंगा नहीं, तो अच्छे और गंदे का पता कैसे लगेगा?” शिवम का मासूम-सा जवाब था. माँ तो रसोई में उसकी बात सुनकर हँस पड़ी, पर पापा उसके सामने कैसे हँसते!
“शिवम, आज हलवा गंदा बना है, तुम मत खाना.” माँ ने कहा.
“आपका बनाया हलवा हमेशा अच्छा ही होता है, जल्दी से दो, बहुत भूख लगी है.” शिवम तुरंत बोला.
“अब मेरी गंदी बात तुमने कैसे सुन ली, सुबह तो कान बंद कर लिए थे!” माँ ने उसका मन टटोला.
“हलवे की बात कभी गंदी नहीं हो सकती, फिर मैं तो बुरा नहीं बोला, अच्छा ही बोला!”
उसकी मासूमियत भरी चालाकी सुनकर मम्मी-पापा हँसे बिना कैसे रह पाते!
शिवम को उनके हँसने-न-हँसने से क्या मतलब, वह तो बहुत सारा हलवा खाने में मस्त था.
मम्मी-पापा मुँह बंद करके हलवे का जलवा देख रहे थे.
— लीला तिवानी
