रंग बदलता इन्सान
जंगल के गिरगिट भी है शर्मसार
रंग बदलना सीख लिया होशियार
वाह रे नालायक तेरी महिमा अपार
गिरगिट की तरह रंग बदले दो चार
हवा की रूख पहचान मुड़ जाना
जैसी देवता पूजा करे मनमाना
पिटारा तेरी चापलुसी भरा भंडार
बहुरूपिये से ये जग है आज लाचार
चमचागिरी में दक्ष है ये निशाचर
झुठी कहानी गढ़ लेता है सरासर
मिथ्या प्रषंशा परोसते जय जयकार
नंगा नाच दिखाते जा उनके दरबार
मुख में राम बगल में है लिये कटारी
नीज मतलब की बना लेते है जुगाड़ी
भाँड़ में जाये जनता की संसार
नई दुनियां की ये है नई अवतार
भीड़ तंत्र का ये होता है सच्चा रखवाला
सफेद पोष में छुपा है इनका चेहरा काला
दुराचारी के पक्ष में खड़ा है ले हथियार
नीच खानदान की ये है नीच किरदार
— उदय किशोर साह
