लघुकथा

प्राइस टेग

कला से जीवन भर का रिश्ता जोड़ने के उद्देश्य से कैलाश सपरिवार साक्षात्कार के लिए आया था। तिलक दहेज की वही रुकावटें एवं नकारात्मक विचार। अगले दिन कैलाश को वाट्सएप पर कला का मैसेज मिला  —- तुम कल 5 लाख का प्राइस टेग लगाकर आए। मैं स्वयं शिक्षका। पापा को कष्ट नहीं होगा। स्वयं तुम्हें खरीद सकती हूँ। तुम स्वयं आत्मनिर्भर। क्यों अहसान ले रहे हो ? अनमोल हो तुम। शिक्षित भी हो ही। कुछ महीनों की बचत से इतना जोड़ने में सक्षम हो। विचार करना। तुम्हारे निर्णय के बाद ही अपना निर्णय सूचित करूँगी।

कैलाश ने विचार कर उत्तर दिया  —- मुझे एक नई राह दिखाने के लिए धन्यवाद। मैनें अपना प्राइस टेग हटा दिया है।

कला का उत्तर  — प्रिय जीवन साथी  , कला अब कैलाश की ही है।
—  दिलीप भाटिया

*दिलीप भाटिया

जन्म 26 दिसम्बर 1947 इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और डिग्री, 38 वर्ष परमाणु ऊर्जा विभाग में सेवा, अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक अधिकारी