मच्छर
मच्छर तुम कितने शैतान!
आसपास भिन – भिन करते हो
मैं हो जाता हूँ हैरान।
पढ़ने बैठूँ, आ जाते हो
मुझे सताकर क्या पाते हो
तुम्हें न एक भी अक्षर आत्ता
मेरा भी बँट जाता ध्यान।
चुपके कहीं काट लेते हो
खुजली और जलन देते हो
खून दूसरे का पीकर क्यों
बनना चाह रहे बलवान।
काम-धाम करना कुछ सीखो
प्राणी सभ्य कभी तो दीखो
खूब हवा में उड़ना आता
इसी बात का तुम्हें गुमान।
क्वायल, स्प्रे कुछ न मानो
चाहे मच्छरदानी तानों
मलेरिया, डेंगू फैलाकर
करते हो कितना नुकसान।
सिर पर अभी परीक्षा आई
कर लेने दो मुझे पढ़ाई
तुम्हें समूल नाश करने को
चलेगा अब स्वच्छता अभियान।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
