भूषण छंद मुक्तक
जंगल, पर्वत करुण रुदन, ताल सरोवर अवरोधन।
स्वार्थी मनु करता निज हित, धरती माता का दोहन।।
पक्षी घुमते इधर-उधर, कहाँ मिलेगा घर पोखर–
ठंडी हो छाया शीतल, अन्न फूल फल हो सोहन।।
जंगल, पर्वत करुण रुदन, ताल सरोवर अवरोधन।
स्वार्थी मनु करता निज हित, धरती माता का दोहन।।
पक्षी घुमते इधर-उधर, कहाँ मिलेगा घर पोखर–
ठंडी हो छाया शीतल, अन्न फूल फल हो सोहन।।