कविता

आत्ममुग्ध समय में

बेहद आत्ममुग्धता में
जी रहे हैं वे।
उनकी संतानें
पहुंच चुकी हैं बड़े – बड़े पदों पर
बहुत ज्यादा पढ़ लिख कर।
उन्होंने बना दिये हैं
बहुखण्डी इमारतें
अपनी नई जवान हो रही
पीढ़ी के लिए।
प्रसन्नता से लबालब
आत्ममुग्धता के साये में
वर्णन किये जा रहे हैं
सिर्फ और सिर्फ अपना।
जबकि नहीं पूछता कोई उनसे
ऐसा कुछ भी
जिससे वे पा सके मौका आत्मप्रशंसा का।
शायद इसीलिए वे कुछ ज्यादा ही
रहते हैं बेचैन
बताने को अपनी प्रगति।
बेहद आत्ममुग्धता में खोये
यह लोग पता नहीं
कब जान पायेंगे
जीवन का रहस्य।
अपना कुछ नहीं होता इस धरा पर।
सबसे बढ़कर है समय
और समय
हमेशा नहीं होता आत्ममुग्ध।
हमीं होते हैं आत्ममुग्ध
जीते हुए
इस आत्ममुग्ध समय में।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

द्वारा विद्या रमण फाउण्डेशन 121, शंकर नगर,मुराई बाग,डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207 M-9670040890