कविता

धराली धराशायी हो गई

धराली धराशायी हो गई,
विपदा भी व्यस्त हो गई,
प्रकृति-प्रेम के झूठे वादों से,
पर्वतीय धरा ध्वस्त हो गई।

गरजे-बिना गरजे थे बादल फटे,
बाढ़ आई क्योंकि जंगल थे कटे,
कंकालों से भर गई धराली सारी,
काश, हमने केवल वादे ही नहीं रटे!

माँ भारती को रहने के लायक छोड़ो,
खुद ही अपनी तरफ सायक मत मोड़ो,
वायु-जल-थल को तो दूषित किया ही,
प्रकृति की लाश पर तो मत दौड़ो!

हँसती हुई वादियाँ आज रो रही हैं,
मां अपने बच्चों की लाशें ढो रही हैं,
अतृप्त रह गए सुनहरे भविष्य के सपने,
जीने की आशाएं भी धूमिल हो रही हैं!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244