गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

काम किए बिन देख निकाले जायेंगे।
चलते – चलते पड़ ही छाले जायेंगे।।

दीवानेपन की हद ही हो जाती है।
प्यार बिना अब कैसे ढाले जाएँगे।।

पी ली जो इतनी कि रहे ही होश नहीं तब।
हाथों से ही छूटे प्याले जाएँगे।।

अंधी सत्ता करती नित ही घोटाले।
कितने ही अब दब हवाले जाएँगे।।

सेंध लगाते लोग रहे घर बंद कभी।
देख नहीं तब तोड़े ताले जायेंगे।।

टूटी आज नहीं धर्मों के जो बंधन।
शोणित के ही बहते नाले जायेंगे।।

बढ़ती रोज़ गयी जो महँगाई ऐसे
फिर तो परिवार न पाले जायेंगे।।

रक्कासा नाचे पेट भरण को उस पर।
ऐसे सिक्के रोज़ उछाले जायेंगे।।

रोज़ बनाते कानून रहें कागज़ पर।
कब तक ऐसे ही ये टाले जाएँगे।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’