कविता

कौन रोक सकता है मुझे

कौन रोक सकता है मुझे
अपनी लक्षित राहों में अनवरत जाने से,
आशातीत सफलता पाने से,
न ये न वो न दोस्त न दुश्मन,
न प्रकृति की बहारें न चिलमन,
प्राचीन काल से बनी बाधाएं हटाते हुए,
अपनी एक अलग राह बनाते हुए,
न रुकना है न थकना है,
शंकाओं को लात मारते
पग से बनते पदचिन्हों को चूमते
कदापि पीछे नहीं हटना है,
हर चालाकी से रचित मधुर दृष्टित
अनंत बेड़ियों को काट काट,
पत्थर से दिख रहे हीरों को छांट छांट,
हां हूं अनुभन विहीन,
लेकिन खोज ही लूंगा रास्ते महीन,
मुझे पता है मेरे अपने कभी भी
देते नहीं हैं किसी का साथ,
शत्रुओं से हो रहे मुलाकातों के कारण,
मुंह से निकलते मृदुल बातों के कारण,
कर जाते रहे हैं विश्वासघात,
लड़ते हुए अपने ही मस्तिष्क के चांडालों से,
राह दिखाने की ख्वाब सी आत्मघाती खयालों से,
मैंने सुना है चले हैं ऐसे ही कई महापुरुष,
तजकर लाव लश्कर जुलूस,
कौन रोक सकता है मुझे
अपनी लक्षित राहों में अनवरत जाने से,
अपनों को हकीकत बताने,दिखाने से।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554