ग़ज़ल
हर कदम अपना बहुत महफूज़ रखा है।
कातिलों ने देवता का रूप रखा है।
पार हो जाए या फिर डूब ही जाये,
बहते दरिया ने भंवर का रूप रखा है।
लुट गयी बस्ती को तुम फिर देखना,
बाअदब जुमलों का कोई भूप रखा है।
मार खाती यह गरीबी जाये तो जाये कहां,
इस दहर में डूबने को कूप रखा है।
यह सफर आसां कहां पांव में छाले पड़े,
जलते सूरज ने जहां में धूप रखा है।
— वाई. वेद प्रकाश
