गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

भावना आहत किया दिल जलाकर आपने।
झूठ का सपना सजाया दिल जलाकर आपने।
आग जब लग ही चुकी सारे दहर में आज तो,
कुछ न कुछ पाया ही होगा घर जलाकर आपने।
हैं बहुत निर्दोष लेकिन सब फंसे थे जाल में,
खाक कर डाले सभी सपने जलाकर आपने।
बाग के सारे परिंदे छूना चाहे आसमां को,
रोक दी उनकी उड़ानें पर जलाकर आपने।
प्यार जिनको रोशनी से शम्में- परवाना वहीं,
मारा डाला उन पतंगों को जलाकर आपने।
दर्द से तुमको बचाया और मेहनतकश बनें,
कर दिया कमजोर सारा पौरुष जलाकर आपने।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

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