गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ये इश्क़ प्यार मोहब्बत सब दिखावा है,
बच जाना तुम ये सिर्फ एक छलावा है।

कोई किसी का नहीं, सब का स्वार्थ है,
मैं सिर्फ तुम्हारा हूँ, खोखला ये दावा है।

जज्बातों की ढ़ाल से खेला जाता खेल,
आखिर हाथ लगता कोरा पछतावा है।

खुद को खुद में ढूंढों, यही बेहतर होगा,
सुनो! यही अपनी खुशियों का बुलावा है।

“विकास” ने बड़े करीब से देखा है सबको,
सिर्फ दर्द मिलेगा, बाकी सब बहकावा है।

— डॉ विकास शर्मा

डॉ. विकास शर्मा

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