कविता

कविता

मेरी चाहत पर्वत सी स्थिर
बहता जिससे गमों का नीर
मन जैसे तपता रेगिस्तान
जो हर पल रहता अधीर
दहकता ज्वालामुखी यादों का
धोखों से छलनी हुआ शरीर
छलिया जमाना छलता रहा
मैं आशीष देता रहा बन फकीर
सर्दी की धूप सा ना मिला कोई
और मैंने छोड़ी नहीं अपनी तासीर
प्रेम के बदले प्रेम मिला नहीं कभी
खुद में समेटे रखी अपनी पीर
“विकास” ने खोले भेद अनेक
पर पढ़ सका ना अपने हाथों की लकीर

— डॉ विकास शर्मा

डॉ. विकास शर्मा

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