गीतिका/ग़ज़ल

तुम्हारी मोहिनी सूरत

माथे पर सजा लाल तिलक लगे ऐसा, जैसे उगते सूरज की लाली हो,
चेहरे की यह खिली मुस्कान लगे ऐसी, जैसे फूलों की कोई डाली हो।

लगे ऐसा, जैसा आँखों में तुम्हारी गहरा और गंभीर समंदर खड़ा हो,
कंधे पर पड़ी काली जुल्फें लगें ऐसी, जैसे उठी घटा अंबर में काली हो।

कानों में पहने ये स्वर्ण कुंडल, शोभा बढ़ा रहे हैं तुम्हारे रूप की,
सादगी लगे ऐसी, जैसे सीप ने मोती बनाने को ओस की बूंद पाली हो।

परिधान में तुम्हारे झलकती संस्कृति, गरिमा का आधार लिए हो,
राधा सी सौम्यता लिए हुए लगती ऐसे, जैसे तुम रुक्मणि निराली हो।

जो देखे तुम्हारी मोहिनी सूरत, वो मदहोश होता जाए पल पल,
अपनत्व का भाव लिए तुम लगी ऐसे, जैसे मन बगिया की माली हो।

सच कहता हूँ, तुम्हारी ये पावन छवि मन बस गयी इस बावरे “विकास” के,
डूब रही थी नैय्या उसकी बीच मंझदार, आकर ही तुम उसे संभाली हो।

— डॉ. विकास शर्मा

डॉ. विकास शर्मा

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