कविता

सुनिश्चित है

जो अहम के वशीभूत हो ठूठ बने रह गए,
उनका एक न दिन तो पतन सुनिश्चित है,
जो ढलना भूल कर उम्र भर अकड़े रह गए,
उनका एक न दिन तो गिरना सुनिश्चित है ।

जो सुपरिवर्तन को सहज स्वीकार न सके,
उनकी एक न दिन तो अवनति सुनिश्चित है,
जो कमियों में सुधार का शिल्प न गढ़ सके,
उनकी एक न दिन तो गिरावट सुनिश्चित है ।

जो आचरण को सुव्यवस्थित न कर सके,
उनकी एक न दिन तो पराजय सुनिश्चित है,
जो समय की कीमत समय रहते न समझ सकें,
उनकी एक न दिन तो दुर्गति सुनिश्चित है ।

जो विनम्रता को व्यहवार में न उतार सके,
उनका एक न दिन तो ह्रास सुनिश्चित है,
जो ऊॅंच-नीच की दीवार को न गिरा सके,
उनका एक न दिन तो विषाद सुनिश्चित है।

जो कड़वाहट को मन से सहज न निकाल सके,
उनकी एक न दिन तो अस्वस्थता सुनिश्चित है,
जो सत्यता के “आनंद” को न अपना सके,
उनकी एक न दिन तो शिकस्त सुनिश्चित है ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु