कविता

कविता – नव संवत्सर : आत्मा का संपादन

समय के आईने में मनुष्यता का पुनर्पाठ
नव संवत्सर की देहरी पर
फिर आ खड़ा है समय—
अधरों पर औपचारिक मुस्कान,
और नेत्रों में अनुत्तरित प्रश्नों का धुंधलका लिए।
पूछता है—
क्या बदलेंगे केवल तिथियों के अंक?
या बदलेगा मनुष्य का अंतरंग भी?
वर्षों की जर्जर पांडुलिपियों पर
अब भी जमी है जड़ता की धूल,
विवेक के स्वरों पर
स्वार्थ का आवरण इतना गाढ़ा क्यों है?
करुणा का व्याकरण
आज भी अशुद्ध क्यों है?
नव संवत्सर!
तेरा स्वागत कैसे करूँ—
जब हर वर्ष
नए संकल्पों के नाम पर
पुराने समझौते लिखे जाते हैं,
और सच्चाइयाँ
हाशियों में निर्वासित कर दी जाती हैं।
तू तो आता है
स्वर्णिम प्रतीकों का उत्सव बनकर,
पर भीतर—
मनुष्यता का छंद
खंड-खंड होकर बिखरता रहता है।
कहाँ है वह अलंकार
जो मन को पुनः मनुष्य बना सके?
कहाँ है वह रस
जो संबंधों में पुनः जीवन घोल सके?
आओ—
इस नव संवत्सर पर
केवल कैलेंडर न बदलें,
स्वयं की चेतना का संपादन करें।
विस्मृत मूल्यों के श्लोकों को
पुनः स्वर दें,
और समय की शून्य पृष्ठभूमि पर
लिखें—
सत्य, करुणा और समता का
एक अडिग महाकाव्य।
क्योंकि यदि अब भी
हमने अपने भीतर के मनुष्य को
जागृत न किया—
तो इतिहास
हमारी संवेदनहीनता को
मौन अपराध की तरह दर्ज करेगा।
और तब—
नव संवत्सर
केवल एक तिथि बनकर रह जाएगा,
परिवर्तन का प्रतीक नहीं।

— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016