हारा हुआ सिकंदर
प्रीत एक सीधी सादी यूपी की रहने वाली लड़की थी। बात उन दिनों की है जब प्रयागराज इलाहाबाद हुआ करता था। उसका बचपन इलाहाबाद में बीता था। प्रथम श्रेणी में 12 वी की परीक्षा पास कर उसे दिल्ली आना पड़ा। पिता जी के ट्रांसफर के कारण।
ग्रेजुएशन की पढ़ाई अब दिल्ली से होनी थी। लेकिन इलाहाबाद उससे छूट ना सका। अक्सर वह बीते दिनों को याद करती थी। स्कूल, वहा की टीचर्स और अपने बचपन की सखी मीता को तो वह बिलकुल भी नहीं भूली थी। एक दिन यूनिवर्सिटी से घर आई तो देखा सखी मीता की शादी का निमंत्रण आया है। प्रीत जाने को मचल उठी। लेकिन शादी मे जाना नहीं हो सका था उसका । प्रीत एक साल बाद किसी काम से इलाहाबाद गई तो में उसकी सखी मीता अपने पति विमल के साथ उससे मिलने आई साथ में एक शक्स और था विमल जीजू ने उसका परिचय देव कह कर करवाया। जो की विमल जीजू के ही करीबी दोस्त थे।
मीता ने प्रीत के बारे मे इतनी बाते कर रखी थीं की विमल को वो बिल्कुल अजनबी नहीं लगी। और हां देव के मन में भी कहीं गहरे उतर गई थी प्रीत।
देव के मन की बात को मीता ने ताड़ लिया और प्रीत के जाने के बाद मीता ने एक दिन देव से पूछ लिया ” भैया मेरी सहेली कैसी लगी?
देव ने मुस्कराकर गर्दन झुका ली। और जाने क्या पढ़ लिया मीता ने देव के चेहरे पर की प्रीत के कोचिंग सेंटर का नंबर देव को दे दिया।
मीता के पति और उनके दोस्त देव दोनो यूपीएससी तैयारी कर रहे थे।
और प्रीत अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ साथ एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाती भी थी। देव के अप्रत्याशित फ़ोन कॉल ने प्रीत को चौंका दिया। पर उसको अनजाने ही देव के फ़ोन की प्रतीक्षा भी रहती थी।
अब कभी कभी बाते होने लगी उसकी देव से ।
देव जो एक लोअर मिडिल क्लास का लड़का गांव से इलाहाबाद पढ़ाई और यूपीएससी की तैयारी के लिए आया था। जेब तंग ही रहती थी उसकी। प्रीत जो की एक छोटी सी जॉब करती थी वह समझती थी देव के हालात को और 15 _ 20 दिन में एक बार देव के मकान मालिक के नंबर पर कॉल कर लेती थी।
देव और प्रीत दोनो ने नहीं सोचा था कि वह साधारण मुलाकात उस पहली बातचीत से एक ऐसा अध्याय शुरू होगा जो वर्षों तक जीवन को प्रभावित करेगा।
धीरे-धीरे परिचय प्रगाढ़ हुआ। बातचीत पहले औपचारिक थी, फिर सहज, फिर निजी।देव प्रीत की बातों को ध्यान से सुनता था । उसके मन को पढ़ता था । समझने की कोशिश करता था। और प्रीत को लगा — शायद यह रिश्ता आगे बढ़ सकता है। उस समय भविष्य साफ नहीं था, पर उम्मीद थी। दिल में हल्की-सी जगह बनती जा रही थी। दोनों के बीच भले ही संवाद कम था पर अहसास बहुत गहरा जुड़ा था।
समय बीतता गया। भरोसा गहराता गया। प्रीत को वैष्णो देवी की यात्रा पर जाने का अवसर मिला। दिल्ली लौटते देव के मेंस के लिए क्वालीफाई करने का समाचार मिला। प्रीत को लगा माँ के दरबार में देव के लिए मांगी हुई दुआ कबूल हो गई। प्रसाद के साथ साथ उसने देव के लिए कुछ उपहार भी भेज दिया एक खूबसूरत पेन, एक टाई और एक डायरी। वह देव के जीवन की पहली टाई थी।
यह सिर्फ उपहार नहीं था। यह उस समय का स्नेह, विश्वास और जुड़ाव था। सभी गिफ्ट एक साथ कोरियर कर दिए गए — सहेली के घर के पते पर। देव की सफलता भी मानों प्रीत के आने ही राह देख रही थी। दो साल से यूपीएससी परीक्षा देता देव इस बार प्रीलिम्स, मेंस दोनो क्लियर कर गया। ये देव की मेहनत का फल था या प्रीत की देव के लिए मांगी गई दुवा का असर था कहना मुश्किल था। देव का सिलेक्शन हो गया वह अब गांव का सीधा साधा देव ना हो कर बहुत बड़ा अधिकारी बन गया था।
सब लोग बधाई दे रहे थे किंतु देव अब तक प्रीत को फोन कर ये खुशखबरी नही सुनाया था। मीता से देव की सफलता का पता चला। लेकिन देव से नही ।प्रीत अंदर से टूट गई। देव को अपनी सफलता को प्रीत से साझा करने का याद भी नहीं रहा। उसे तो उम्मीद थी की देव सबसे पहले ना सही एक दो दिन में तो मौका निकाल कर उसको फोन कर ये खुश खबरी बता ही सकता था। लेकिन देव के इस रवैए से काफी आहत हुई थी प्रीति। कुछ टूट सा गया था उसके अंदर।
अब देव अधिकारी बन गया था। मसूरी ट्रेनिंग के लिए जाना था। घर वालों के पास लोग शादी के प्रस्ताव लिए बिल्कुल टूट पड़े थे जिस घर के आगे कभी कोई टेंपो तक ब मुश्किल रुकी होगी गांव के उस घर के आगे लाल बत्ती वाली अनेकों गाडियां खड़ी रहती थी। बड़े बड़े अधिकारी और बड़े बड़े बिजनेसमैन भी अपनी धन पारियों के लिए देव को खरीदने को आतुर थे।
इसी बीच प्रीत का विवाह विवाह भी तय हो गया। हालाकि पिता ने पूछा भी था प्रीत से की उसको लड़का पसंद तो है ना? क्या कहती प्रीत जो उसको पसंद था उसने तो उसे कुछ समझा ही नहीं। और सगाई हो गई प्रीत की। देव के फाइनल सिलेक्शन के लगभग 1 महीने होने को आए थे प्रीत अब तक यही नहीं समझ सकी देव उसको जान बूझ कर अवॉइड कर रहा है या सच में उसके अंदर प्रीत को लेकर कोई फीलिंग्स थी ही नहीं या अब वो बदल गया है। कश्मकश के बीच फंसी प्रीत और सफलता की सीढ़ी चढ़ता देव…….
इसी बीच लोकसेवा आयोग में कुछ औपचारिकता के लिए देव दिल्ली आया था। अब उसे प्रीत की याद आई
देव ने फ़ोन किया उसने प्रीत से भी मुलाकात के लिए कहा और प्रीत इनकार न कर सकी । उसे अपनी सगाई की खबर भी देव को देना था। वह देव को सुनना चाहती थी। फ़ोन पर तो क्या ही शिकायत करती।
देव मिलने आया। सगाई की फोटो देखी। फोटो में सादी में लिपटी प्रीत को देख कर शायद पहली बार देव को प्रीत को खो देने का भय हुआ या सोई मुहब्बत जागी या जाने क्या हुआ इसका सही सही पता तो प्रीत को नहीं चला लेकिन जो भी हुआ हमेशा चुप रहने वाला देव बोला ” मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं प्रीत ” तुम ये सगाई तोड़ दो। प्रीत ने बिना कुछ सोचे देव की बात मान ली और तोड़ दिया सगाई। देव प्रीत के घर उसके पापा से मिलने आया फिर उनसे मिलकर बोला आप मेरे घर जाए और मेरे परिवार वालो से रिश्ते की बात करे। प्रीत के पापा देव के गांव गए। देव के पिता ने कहा कि हम आप को विचार कर के बताएंगे। इधर प्रीत के पापा इंतजार करते रहे उधर देव ने बिना प्रीत को बताए शादी कर ली। UPSC की ट्रेनिंग मे ही उसे एक लड़की मिली उसी से उसने विवाह कर लिया। इतने बड़े फैसले में न प्रीत को कुछ बताया ना उससे कोई मशविरा किया बस देव ने शादी कर ली।
एक दिन जब प्रीत ने देव को फोन किया तो पता चला की देव शादी के लिए घर गए हैं। । सुन कर टूट गई प्रीत । इधर प्रीत के पिता जी देव के घर से जवाब आने की राह देख रहे थे। उधर देव ने तो सीधा विवाह ही कर लिया था। देव ने देखा ट्रेनिंग मे मिली प्रतीक्षा को और जाना की प्रतीक्षा के पिता और तीन भाई सब के सब बड़ी पोस्ट पर है और जमींदार तो वो लोग थे ही । जाति भी एक है दोनो की। खैर जाति कुल गोत्र तो प्रीत से भी मिल ही रहा था किंतु प्रीत की बजाय प्रतीक्षा से विवाह करना देव के दिमाग को तर्क संगत लगा। शायद इसी लिए उसने प्रतीक्षा की चुना। घर वाले भी बहुत खुश थे की देव ने एक बहुत बड़े परिवार में शादी के लिए सोचा है। अब पति पत्नी दोनो अधिकारी होंगे तो घर की तरक्की दुगनी स्पीड से होगी।
दिल और दिमाग में कोई जंग नहीं हुई या कह लो दिल को बोलने का मौका देव ने दिया ही नहीं। देव ने लाभ देखा। लेकिन प्रीत इतने गहरे उतर गई थी उसके दिल में की वह उसको भूल न सका। या शायद अधिकारी और बड़े घर की लड़की प्रतीक्षा ने देव के दिल पर कभी दस्तक दी ही नहीं।
विवाह के एक हफ्ते बाद ही देव और प्रतीक्षा अपने पोस्टिंग पर आ गए। देव मीलों गाड़ी चला कर जब घर आता तो नौकर खाना दे देता प्रतीक्षा को देव ने अपनी प्रतीक्षा करते कभी नही पाया। सोती हुई अमीर अधिकारी बीबी को जगाना देव इतना साहस कभी नहीं जुटा पाता। फिर तो दांपत्य की शुरुवात मे भी रोमांस नही था।
खाना पीना सब नौकर ही देखते थे। देव कभी प्रतीक्षा से सर पर तेल रखने को कहता तो फट से प्रतीक्षा नौकर को आवाज़ देती आओ साहब के सिर पर तेल लगा दो अब देव चुप। देव को बार बार प्रीत याद आती। जो उसका बहुत ख्याल रखती थी। देव की शादी के 25-30 दिन बाद ऑफिस में देव का फोन आया प्रीत के ऑफिस में। प्रीत ने कहा हेलो
कुछ सेकंड की चुप्पी। फिर आवाज़ — “प्रीत प्रीत”
वो आवाज तो प्रीत तुरंत ही पहचान गई। फिर भी बेहद शांत स्वर में पूछा — “आप कौन?”
फोन पर सन्नाटा छा गया। और फिर कॉल कट गया। देव के पास प्रीत के प्रश्न का उत्तर नहीं था। शायद वह खुद तय नहीं कर पाया था कि वह प्रीत के जीवन में अब क्या है — अतीत, पछतावा या अधूरा रिश्ता।
कुछ दिन तक सब सामान्य रहा। फिर अचानक प्रीत की सहेली मीता के पति का फोन आया।
जीजा जी ने कहा — “देव उसका दिया सारा गिफ्ट और स्वेटर वापस करना चाहता है। बताओ कहाँ भेजें?”
सुनकर हाथ कांप गए।
प्रीत ने गहरी साँस लेकर कहा — “मैंने वापस लेने के लिए नहीं दिया था। अगर नहीं रखना तो किसी भिखारी को दान कर दे या फेंक दें।” फोन कट गया।
उस क्षण प्रीत को पहली बार लगा — मेरा स्नेह लौटाया नही जा रहा है बल्कि अपमानित किया जा रहा है।
उस दिन प्रीत ने चुपचाप एक निर्णय लिया — वह खुद को वहाँ से धीरे-धीरे अलग कर लेगी। और उसने सहेली से भी दूरी बना ली। मीता के पति को बोल कर प्रीत ने अपने पिता कहलवा दिया की देव शादी हो गई है। उसके घर वाले नहीं मान रहे हैं।
खैर प्रीत ने भी तीन साल बाद शादी कर ली। नया जीवन, पुराना साया फिर भी जीवन स्थिर हुआ। नई जिम्मेदारियाँ आईं। प्रीत पत्नी बनी। फिर माँ। और हर जिम्मेदारी को उसने दिल से निभाया।
पर अतीत कभी पूरी तरह मिटता नहीं। सहली से संपर्क तोड़ लिया था प्रीत ने । वह सबसे दूर मुंबई में पति के साथ रहने लगी । दो बच्चे थे और पति भी ठीक थे। पर प्रीत कभी कभी देव को याद कर ही लेती थी और सोचती थी आखिर क्यूं किया देव ने ऐसा । शादी नही करनी थी तो ना सही कम से कम उससे मिल कर उसको अपनी मजबूरी बता कर जाता। देव भी एक पल के लिए भी प्रीत को भूल नहीं सका था।
इधर 25 साल बीत गए थे प्रीत के विवाह के। किसी तरह प्रीत फिर मीता के संपर्क में आ गई थी। शायद फेसबुक की मेहरबानी थी।
सखी के संपर्क मे आई तो फिर मीता ने देव का जिक्र छेड़ दिया। विवाह के कुछ साल बाद ही देव गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए थे । लीवर ट्रांसप्लांट हुआ। जान मुश्किल से बची। बीमारी में उसने प्रीत को याद किया था । उसे अपराधबोध था उसने कहा — “शायद मुझे प्रीत की बददुआ लगी है।”
मीता ने जवाब दिया — “वह बददुआ देने वाली नहीं है।” और सच भी यही था। प्रीत ने कभी देव का बुरा नहीं चाहा। उसने बस उसे जाने दिया था।
कभी-कभी लोग अपने गलत फैसलों का दर्द किसी और के नाम पर डाल देते हैं। पर जीवन का हिसाब ऐसा नहीं चलता। देव खुद अपने ही फैसले से अब खुश नही था। उसे हर पल प्रीत याद आती थी। उसने हर तरीके से प्रीत से बात करने की कोशिश की किंतु प्रीत तो जैसे सब से दूर अपनी ही दुनियां में रहती थी। उसके बच्चे ही उसकी दुनिया थे।
इसी बीच प्रीत की बेटी काफी बीमार हो गई थी। कोई इलाज काम नहीं कर रहा था तो बीमारी और बदले हालात से प्रीत टूट गई थी। अस्पताल की दीवारें, रात की बेचैनी, माँ का डर — यह प्रीत के जीवन का सबसे कठिन दौर था। मीता ने देव को यह खबर दी। देव को प्रीत के बारे में जानने की काफी उत्सुकता थी । प्रीत की बेटी की बीमारी के बारे में जान कर उसे भी बहुत दुख हुआ।उसने अपने संपर्कों से इलाज में मदद की। कुछ महत्वपूर्ण दरवाज़े खुल गए। मेरी प्रीत की बेटी ठीक हो गई। मीता ने संदेश दिया देव एक आखिरी बार प्रीत से मिलना चाहता है। मीता बोली अब क्या करेगे मिलकर और टाल दिया।
एक दिन फिर प्रीत से मीता ने कहा बड़ी हिम्मत कर के” एक बार देव से मिल लो” मीता ने कई तरह से प्रीत को समझाया और प्रीत मान गई। तय हुआ की प्रीत प्रयाग आएगी मां गंगा स्नान के लिए और वही देव से भी मुलाकात होगी। देव भी आगरा से प्रयाग आ जाएगा।
एक रेस्टोरेंट में प्रीत, मीता और देव मिले। उस समय प्रीत के भीतर कोई पुराना प्रेम नहीं था। न कोई शिकायत। बस एक माँ की कृतज्ञता थी।
कुछ समय बाद देव और प्रीत की मुलाकात हुई। वह सामने था — चेहरे पर दर्प था सफलता का। अफसरी ठाठ बाट भी दिखा । लेकिन प्रीत की आंखों ने वो भी देख लिया जो देव अपनी चमक दमक के पीछे छुपाना चाह रहा था। बीमारी से थका हुआ, जीवन के उतार-चढ़ाव से झुका हुआ। अपने फैसलों, अपनी गलतियों और प्रीत को खो देने के अफसोस से दबा हुआ देव। देव की आँखों में पछतावा था।
प्रीत ने उसे देखा — न गुस्से से, न प्रेम से। बस एक इंसान की तरह। यह मुलाकात वापसी नहीं थी।
यह एक बंद अध्याय को आख़िरी बार पढ़कर
पन्ना बंद कर देने जैसा था।
प्रीत स्थिर थी। क्यूं की उसने देव को पाने की सारी कोशिश कर ली थी और प्रीत को अब कोई अफसोस नहीं था। और जो कुछ मिला उसे नियति मान लिया था उसने। लेकिन देव कश्मकश में था । काश उसने ऊंचे घराने और अफसर बीबी के लालच में ना पड़ कर अपने दिल की आवाज सुनी होती तो वह आज दुनिया का सबसे खुश इंसान होता।
क्यूं की उसका मन तो प्रीत की प्रीति डोर से कभी अलग नहीं हो सका। और समय ने आखिरकार न्याय कर दिया — किसी के पक्ष में, किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सच के पक्ष में। आज देव जो यूपीएससी परीक्षा में पास हो कर भी जीवन की परीक्षा में फेल हो गया था। वहीं प्रीत देव को खो कर भी जीत चुकी थी।
अंतिम मुलाकात थी दोनो की । देव ने कभी कभी फ़ोन करकने की इजाजत मांगी प्रीत ने कहा आप को मुझे फ़ोन करने के लिए इजाजत किसी से नहीं मांगनी है मुझ से भी नही, आप कॉल कर सकते है
मीता वहा से किसी बहाने से चली गई।
प्रीत और देव के बीच मौन पसरा हुआ था। थोड़ी बहुत औपचारिक बात हो ही रही थी कि अचानक प्रीत के पति का फ़ोन आया कि प्रीत अभी तुरंत ही घर आ जाए। और प्रीत को उठना पड़ा शायद किस्मत अब उन्हें पल दो पल के लिए भी मिलने नही देना चाहती थी। आज देव चाह कर भी प्रीत को रोक नहीं पाया। प्रीत नम आंखों से देव को देखती है। और गाड़ी में बैठ जाती है वापस एयरपोर्ट जाने के लिए जिससे जल्द से जल्द घर पहुंच जाए।
कैफे में एक गजल बज रही थी-
मै सिकंदर हूं मगर हारा हुआ
मैं तेरे प्यार का मारा हुआ हूं।
देव एक ऐसा सिकंदर था जो जीत कर भी हार गया था।
— प्रज्ञा पाण्डेय मनु
