ग़ज़ल
जो सच को भी सच कहने की ज़ुर्रत नहीं करते
हम ऐसे किसी शख़्स की इज़्ज़त नहीं करते
दुनिया से उन्हीं लोगों को रहती है शिकायत
वे लोग जो ख़ुद ही से मुहब्बत नहीं करते
मंज़िल की है दरकार उन्हें बैठे बिठाये
जो घर से निकलने की भी हिम्मत नहीं करते
हर वक़्त मेरे साथ ही रहते हैं मेरे ग़म
दो चार घड़ी को भी ये हिजरत नहीं करते
हर काम तसल्ली से किया जाये तो बेहतर
‘अज्ञात’ किसी काम में उजलत नहीं करते
— अजय अज्ञात
