व्यंग्य – झोले में झमेला
झोला उठाना पुराने समय में खराब होता होगा। लेकिन आज के समय में झोला उठाने वाला सबसे ज्यादा चुस्त- दुरूस्त -और तँदरूस्त लोग हैं । जैसे बरसात का सीजन आते ही झाँड़ -झँखाड़ फलने- फूलने लगता है। जँगली घास बेतरह और बेतरतीब बढ़ने लगती है। जँगली अरबी के पत्ते फूलाने लगते हैं। झोला उठाने वाला आज के समय में वैसे ही फलता -फूलता है। अबाध गति से उसकी उतरोत्तर वृद्धि होती है। आप देखेंगें कि जो लोग झोला उठाकर मालिक के पीछे- पीछे चलते थे। वे अचानक से मालिक से आगे निकल गए। अब हालत ये है कि मालिक भी किसी का झोला उठाने की बाबत सोच रहा है। गुरू गुड़ ही रह गया। और चेला चीनी हो गया। झोला उठाने वाला पेंड सदा हरा -भरा रहता है। सदा मुस्कुराता रहता है।
संसार का सबसे ज्यादा फलने और फूलने वाला जो शख्स है। वो झोला उठाने वाला शख्स है। जो शख्स झोला उठाता है। वही शख्स सबसे सुखी है। आपने देखा है किसी ऐसे शख्स को जो झोला उठाए और दुखी हो। जिसने झोला उठाया उसके सुख में हमने उतरोत्तर वृद्धि होते ही देखी है। झोला उठाने वाला कभी दुखी नहीं हो सकता। लेकिन शर्त ये है कि झोला उसका नहीं होना चाहिए। उसको अपना झोला नहीं उठाना है। अपना झोला उठाकर आपको थकान ही हो सकती है। श्रीवृद्धि हो इसके लिए दूसरों का झोला उठाईए। आपको मजदूर नहीं बनना है। झोला उनका उठाना है। उसका जो मालदार हों। जो तीन -पाँच जानते हों। ऐसे स्टेशन पर झोला उठाने वाले किसी आदमी को मैंनें फलते -फूलते नहींं देखा है। झोला उनका उठाईए जिनके पास भर- भर बोरा है।
लोग बातों- बातों में ही झोले के बारे में कहते हैं, कि हमारा क्या है। हम तो झोला उठाकर चल देंगें। झोला उठाकर चलने वाला आदमी हमेशा नौकर होता है। झोला उठाने वाला आदमी नमक नहीं खाता। जो उसे नमक के अदायगी का बोध हो। ऐसे झोला उठाने वाले लोग रीढ़-विहीन होते हैं। जितना जमीन के ऊपर हहोते हैं। उतना ही जमीन के नीचे। जिनको मालिक के नफा -नुकसान से मतलब नहीं होता है। हमेशा जल्दी में होते हैं। जितना बताओ उतना ही काम करते हैं। मालिक का फायदा किसमें है , इस पर कभी विचार नहीं करते। वो बस झोला उठाकर चलने की जल्दी में रहते हैं। झोला उठाने वाले लोग कृतघ्न होते हैं। जिनका संबंध मालिक से बस इतना ही होता है कि वे उनका झोला उठाते हैं।
जो लोग झोला उठाकर चलने में जल्दीबाजी दिखाते हैं। ऐसे लोगों में ठहराव नहीं होता है। ऐसे लोग घाट- घाट का पानी पिए हुए होते हैं। इनकी कोई स्थायी मँजिल नहीं होती है। ये हमेशा बेहतर की तलाश में रहते हैं। बेहतरीन मिलने पर झोला उठाने वाले लोग बेहतर को हमेशा छोड़ते चले जाते हैं!
— महेश कुमार केशरी
