कविता – चिठ्ठियों की ख्वाहिश
आज सालों बाद खुला सँदूक
तो उसमें मिली कुछ चिठ्ठियाँ ,
चिठ्ठियों के दिन पुरे हो चुके थे
पीले पड़ गए पुराने पृष्ठ
जगह- जगह से टूटते …
चिठ्ठियाँ बच्चों की तरह थीं जोर
से खुलने लायक नहीं बल्कि
धीरे -धीरे संभालकर !
चिठ्ठियाँ उछलकर बैठ गईं
मेरी गोद में
मनुहार करने लगीं पढ़ो मुझे
मैंनें झिड़क दिया चिठ्ठियों को
कहा उतरो मेरी गोद से
मैं अभी बहुत व्यस्त हूँ
तुम्हें पढ़ने का वक्त नहीं है ,मेरे पास !
चिठ्ठियाँ अनुनय करने लगीं
सुबकने लगीं
उनकी पीठ छुआ तो वे रोने भी लगीं
बताया अपना दु:ख कि उनको लोग
अब पढ़ते -लिखते नहीं
कहा मैं अब सँदूकचे में नहीं
रहना चाहती
वहाँ अँधेरा होता है ,हमेशा
कोई बोलने बतियाने वाला
नहीं होता है वहाँ
मैं रहना चाहती हूँ तुम्हारे
सिरहाने ताकि तुम जब तब
समय निकालकर पढ़ो
मुझे
चिठ्ठियों को खोलते वक्त
शब्द झर रहे थे
सँवेदनाएँ गिर- गिर पड़ती थीं
आड़े -तिरछे अक्षरों का जाल
जिससे भाव पता चलता था
अगर चिठ्ठियों ने ये अनुरोध
ना किया होता
तो मैं उन्हें मोड़कर वापस रख देता
अभी रात का समय था मैंनें
बड़ी वाली बत्ती जलाई और
पढ़ने लगा चिठ्ठियाँ
बरसों की यादें ताजा होने लगीं
शब्द वही पुराने थे
लेकिन मैं भींगने लगा सँवेदनाओं
की नदी में
मैं बार – बार पढ़ने लगा चिठ्ठियों को
और पकड़ने की चेष्टा करने लगा
शब्दों में छूटे हुए अर्थ !
— महेश कुमार केशरी
