कहानी

खामोश दरख्तों की गवाही

केरल के घने और हरे-भरे मन्नार के जंगलों के बीच से गुज़रती वह सड़क किसी भूल-भुलैया से कम न थी। ऊंचे-ऊंचे सागवान के पेड़ और बादलों से बातें करती पहाड़ियाँ एक अजीब सा तिलस्म पैदा कर रही थीं। मेरा नाम आर्यन है, और मैं अक्सर इन रास्तों से अपनी जीप में औषधीय जड़ी-बूटियों का संग्रह करने निकलता था।

उस शाम मूसलाधार बारिश ने रास्ता रोक दिया। मेरी जीप एक कीचड़ भरे मोड़ पर धंस गई। काफ़ी मशक्क़त के बाद भी जब पहिए टस से मस न हुए, तो मैंने अपने साथी राजू को गाड़ी की रखवाली के लिए छोड़ दिया। पास ही एक पुराना लकड़ी का पुल पार कर मैं मदद की उम्मीद में घने वनों के बीच बसे एक छोटे से बसेरे की ओर चल पड़ा।

वहां बाँस के झुरमुटों के बीच एक छोटा सा मिट्टी का घर था, जहाँ से ताजी कहवा (कॉफ़ी) की खुशबू आ रही थी। वहां मेरी मुलाक़ात मीरा से हुई। उसकी आँखों में वैसी ही गहराई थी जैसी उन जंगलों की रातों में होती है। वह अकेली रहती थी और मुसाफ़िरों को राह दिखाती थी। उस रात की बारिश ने मुझे वहीं रुकने पर मजबूर कर दिया। हमने सारी रात पुराने गीतों और अधूरी कहानियों के साये में गुज़ारी। जाते वक्त मैंने अपनी चांदी की नक्काशीदार चेन उसे दी और वादा किया, “जब इन पेड़ों पर नए फ़ूल खिलेंगे, मैं तुम्हें लेने आऊंगा।”

साल बीत गया। मैं अपनी दुनिया की मसरूफ़ियतों में ऐसा उलझा कि खुद को भूल गया, पर मीरा का वह मासूम चेहरा नहीं भुला पाया। जब मैं दोबारा उन सुंदर वनों में पहुँचा, तो मंज़र बदल चुका था। मीरा वहीं थी, पर उसकी आँखों में अब वह पहचान न थी।

मैंने कहा, “मीरा, मैं अपना वादा निभाने आया हूँ।”

वह कुछ न बोली, बस मुस्कुराई,एक ऐसी हंसी जिसमें दर्द की परतें थीं। वह अंदर गई , वो मुझे पहचान गई थी, शायद,और एक पुराना लकड़ी का बक्सा ले आई। जब उसने उसे खोला, तो मेरी रूह कांप गई। उसमें दर्जनों वैसी ही ज़ंजीरें और धागे और  अंगूठियां ओर भी कुछ ऐसे ही सामन थे भरे पड़े थे।

उसने धीमी आवाज़ में कहा, “आर्यन, इस जंगल में हर मुसाफ़िर को लगता है कि उसका वादा सबसे अलग है। ये देखो, ये सब वही वादे हैं जो रास्तों की धूल बन गए।”

मेरी आँखों में आँसू भर आए। मुझे महसूस हुआ कि वक़्त ने हम दोनों के बीच एक लंबी ख़ामोशी बुन दी है। पर मेरा इरादा पक्का था। मैंने उन तमाम ज़ंजीरों के बीच से अपनी वही पुरानी चेन उठाई,वह मेरी रूह की तरह मैली हो चुकी थी पर टूटी नहीं थी। में कुछ देर के लिए बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हुआ, फिर मैने हिम्मत की,आगे बढ़ा,मैंने उसके हाथ थामे और कहा, “ये सब शायद यादें होंगी, पर मेरी चेन में आज भी उस रात की बारिश की महक है। मुझे माफ़ कर दो कि मैं देर से आया, पर मैं तुम्हें इन यादों के बक्से में क़ैद नहीं रहने दूँगा।”

मीरा की आँखों से एक क़तरा गालों पर ढलक गया। उसने बक्सा बंद कर दिया और उसे ज़मीन में गाड़ दिया। वह बोली, “आज इन दरख्तों ने एक सच्चा वादा मुकम्मल होते देखा है।”

मैंने अपनी जीप की चाबी राजू को थमा दी और उससे कहा, “शहर लौट जाओ, मेरा ठिकाना अब ये खामोश दरख्त और मीरा की हंसी है।”

सूरज डूब रहा था, पर उन सुंदर वनों में एक नई सुबह का आगाज़ हो रहा था। अब वहां कोई मुसाफ़िर नहीं आता था, क्योंकि उस छोटे से घर में अब एक मुसाफ़िर ने अपनी मंज़िल पा ली थी। कभी-कभी ज़िंदगी पाने के लिए पुरानी दुनिया को पीछे छोड़ना ही सबसे बड़ी भावनात्मक जीत होती है।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।