चेहरों पे नकाब
एक चेहरा ही काफी हैं! रंग दिखाने के लिए।
फिर क्यूँ ? चेहरें पे चेहरा लगाके घुमते हैं लोग।।
आगे कुछ, पीछें कुछ ओर फितरत हैं सबकी।
कितना झूठ बोल, खुदकों सच दिखातें हैं लोग।।
नहीं आतें मुझे दिखाने! ये गिरगिट से रंग।
आईनें से भी स्पष्ट है! तभी तो सबको चुभते हैं हम।।
लिबास की तरह बदलतें हैं बातें! सब के सब।
जो! एक लिबास में रहें, आज उसें गंदगी कहतें हैं लोग।।
झूठी-मीठी बातों से, रिश्तों की गंदगी को ढ़कते लोग।
सचकह, रिश्ता निभाने की ताकत क्यूँ ? नहीं रखतें लोग।।
मुँह पर सच कहनेवाले! चुभते हैं काटें की तरह।
सच कहकर मुकर जाएं जो! क्या? सच्चे है वो लोग।।
सच इतना सरल नहीं होता! खुदसे ही लड़ना पड़ता हैं।
हिम्मत कर! अपनों के खिलाफ भी खड़े होना पड़ता हैं।।
— रीना सिंह गहलोत रचना
