किताबों का कारोबार या शिक्षा का अधिकार ?
हर साल नई किताबें : बच्चों पर बोझ और प्रकृति पर चोट
शिक्षा किसी भी देश की प्रगति का आधार होती है। एक शिक्षित समाज ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है। किताबें ज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन जब यही किताबें शिक्षा के बजाय व्यापार का माध्यम बन जाएँ, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। आज हमारे देश में हर साल बच्चों से नई किताबें खरीदवाई जाती हैं, चाहे पुरानी किताबें अच्छी हालत में ही क्यों न हों। यह व्यवस्था छात्रों, अभिभावकों और पर्यावरण तीनों के लिए हानिकारक है।
विदेशों के कई देशों में स्कूल साल की शुरुआत में बच्चों को किताबें उपलब्ध कराते हैं और सत्र समाप्त होने पर वापस ले लेते हैं। वही किताबें अगले वर्ष दूसरे बच्चों को दे दी जाती हैं। इससे खर्च भी बचता है और संसाधनों का सही उपयोग भी होता है।
लेकिन हमारे यहाँ अधिकतर स्कूल हर साल नई किताबों की सूची जारी करते हैं। कई बार किताबों में केवल कवर बदल दिया जाता है या कुछ पन्नों का क्रम बदल दिया जाता है, ताकि पुरानी किताबें दोबारा उपयोग न हो सकें। इससे हर परिवार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।
“नई किताब नहीं, सही व्यवस्था चाहिए।”
हर साल नई किताबें खरीदवाने के नुकसान
- अभिभावकों पर आर्थिक बोझ
मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए हर साल किताबें, कॉपियाँ, यूनिफॉर्म और फीस का खर्च उठाना कठिन होता है। कई परिवार कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई करवाते हैं। - गरीब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है
कुछ बच्चे महंगी किताबें समय पर नहीं खरीद पाते, जिससे उनकी पढ़ाई पीछे रह जाती है। इससे शिक्षा में असमानता बढ़ती है। - पर्यावरण को भारी नुकसान
किताबों के लिए कागज चाहिए, कागज के लिए पेड़ों की कटाई होती है। हर साल लाखों किताबें छपने से जंगल कम होते हैं और प्रदूषण बढ़ता है। - संसाधनों की बर्बादी
पुरानी किताबें उपयोगी होने के बावजूद कबाड़ में चली जाती हैं। यह धन और सामग्री दोनों की बर्बादी है। - शिक्षा का व्यवसायीकरण
कुछ स्कूल, प्रकाशक और दुकानदार मिलकर शिक्षा को कमाई का जरिया बना देते हैं। इससे शिक्षा सेवा नहीं, व्यापार बन जाती है।
“शिक्षा सेवा बने, व्यापार नहीं।” - बच्चों पर मानसिक दबाव
हर साल नई किताबें, नया खर्च और पढ़ाई का बोझ बच्चों तथा अभिभावकों दोनों पर तनाव बढ़ाता है।
समाधान और सुझाव - बुक बैंक सिस्टम लागू हो
स्कूलों में किताबें छात्रों को वर्षभर के लिए दी जाएँ और सत्र के अंत में वापस ली जाएँ। - पुरानी किताबों का पुनः उपयोग
सीनियर छात्रों की किताबें जूनियर छात्रों को दी जाएँ। इससे खर्च कम होगा। - एक समान पाठ्यक्रम
बार-बार किताब बदलने के बजाय कई वर्षों तक एक ही पाठ्यक्रम रखा जाए। - डिजिटल किताबें उपलब्ध हों
ई-बुक और पीडीएफ माध्यम से किताबें मुफ्त या कम कीमत में दी जा सकती हैं। - सरकार सख्त नियम बनाए
स्कूलों को अनिवार्य रूप से केवल जरूरत की किताबें ही लगाने की अनुमति हो। - अभिभावक समिति बने
हर स्कूल में अभिभावकों की समिति हो जो किताबों और फीस पर निगरानी रखे।
निष्कर्ष:- शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को ज्ञान देना है, न कि अभिभावकों पर बोझ डालना। हर साल नई किताबें खरीदवाने की परंपरा पर रोक लगनी चाहिए। किताबें साझा संसाधन बनें, शिक्षा सरल और सस्ती बने, तभी देश का भविष्य मजबूत होगा।
— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
