कविता

पिता की रौशनी

हाँ बेटा, मैं तुझे अंधेरे से बचाना चाहता हूँ,
जीवन के कुछ मूल सूत्र समझाना चाहता हूँ।

ये सही है, मेरा बार-बार टोकना
तुझे शायद अच्छा नहीं लगता,
मुझसे खुलकर बात करने का मन
अक्सर ही कतराता, भटकता।

मेरी डाँट, मेरे शब्द
तुझे जैसे चाकू-छुरा लगते हैं,
पर इन्हीं में छुपे भाव मेरे
तेरे भविष्य के रक्षक बनते हैं।

तू क्यों नहीं समझ पाता है
इन बातों की गहराई को,
बात पूरी सुने बिना ही
छोड़ देता है सच्चाई को।

जल्दबाज़ी छोड़, धैर्य का ताप सहना सीख,
अपने पैरों पर चलना, खुद को गढ़ना सीख।

हर एक फरमाइश के पीछे
कितनी मेहनत झेल रहा कोई,
अपनी ही ज़िंदगी, अपने ही तन से
कितना खेल रहा कोई।

वक़्त किसी के लिए नहीं ठहरता,
ये सच्चाई याद रखना,
जो पसीने से खेलते हैं
उनके पाँव में छाले भी हार मानते ये बात समझना।

सूरज ढलता है तो
नई सुबह का उजाला लाता है,
पर पिता जब ढल जाता है,
तो जीवन अंधकार ही पाता है।

इसलिए, अभी भी समय है—
पिता की छाँव का मान कर लो,
कहीं देर न हो जाए,
उनके होने का सम्मान कर लो।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

Leave a Reply