मुक्तक/दोहा

असह्य ग्रीष्म के दोहे

सूरज आतिश बन गया, तपे नगर सब गाँव ।
जीवों में अकुलाहटें, ढूंढ रहे सब छाँव ।।(१)

लू चलती है गति लिए, बिलख रहा इंसान।
सब नदियों से छिन गई, अब बस सारी आन।। (२)

चाबुक सड़कों पर चले, आतंकित हर एक ।
दिनकर के तो आजकल, नहीं इरादे नेक ।।(३)

कूलर, पंखे हँस रहे, शीतलता का मान ।
मटके ने इस पल “शरद’, पाया नवल विहान ।।(४)

किरणें ना किरणें लगें, बरस रही है आग ।
बचना तुम चाहो अगर, तो लो बचकर भाग ।।(५)

कम्बल अब बेकार हैं, बिरथा ऊनी वस्त्र ।
किरणें हमले कर रहीं, बनकर नित ही शस्त्र ।।(६)

नीर सरीखा बह रहा, तन से बेहद स्वेद ।
इस मौसम में हो रहा, हर इक जन को खेद ।।(७)

बिजली लगती है सुखद, जिससे झरती शीत।
हम तुम, सब ही कष्ट में, सुन लो मेरे मीत।। (८)

सुबह हमें लगती भली, दिन बरसाता आग।
फिर जी-भर फुँफकारता, आतप का तो नाग।। (९)

नीर गिरे आकाश से, देखे मानव राह।
पर अब इस पल तो जग रही, हर दिल से ही आह।। (१०)

— प्रो (डॉ) शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com

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