मुक्तक/दोहा

कुर्सी गाथा

कुर्सी से सदैव करें, जो भी प्यार दुलार
वही नेता स्वयं का, रमेश करें उद्धार

कुर्सी छिनने वास्ते, रहता है तैयार
हरदम जतलाता सदा, अपना ही अधिकार

चलता कुर्सी पर सदा, जिसका सारा जोर
इसके अलावा न दिखे, उसे तो कहीं ओर

चलती कुर्सी वास्ते, देखो खींचतान
इस वास्ते शरीफ भी, बन जाते शैतान

कुर्सी बिना चैन नहीं, मिले नहीं सुरताल
मारे-मारे वे रहे, नेताजी बदहाल

कुर्सी का लालच दे, पाता है उजियार
उस नेता को दीजिये, कुर्सी मेरे यार

कुर्सी जिसको मिल गई, सेके उससे हाथ
खूब मजे में आज है, कल तक थे फुटपाथ

कुर्सी पाने वास्ते, लगा रहे है दाॅंव
इसमें ही उलझे रहे, शहर और सब गाँव

कुर्सी पाकर आज तू, उड़ ले इस आकाश
धम से गिरेगा एक दिन, होगा पर्दापाश

कुर्सी पाते चढ़ गया, कैसा देख जुनून
खाकर नेता देश का, करता रमेश ख़ून

— रमेश मनोहरा

रमेश मनोहरा

शीतला माता गली, जावरा (म.प्र.) जिला रतलाम, पिन - 457226 मो 9479662215

Leave a Reply