हास्य व्यंग्य

हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ

हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं वही प्रजाति हूँ जो इस महान गणराज्य की धूल भरी अलमारियों, फाइलों की सीलन, टूटे पंखों, चाय के दागों, पान की पीकों, सरकारी मुहरों, नोटशीटों और “अभी साहब मीटिंग में हैं” जैसी अमर पंक्तियों के बीच पिछले कई दशकों से जीवित है। यदि भारत एक विशाल लोकतांत्रिक जंगल है तो मैं उसका सबसे टिकाऊ जीव हूँ। साम्राज्य बदले, सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, योजनाएँ बदलीं, नारे बदले, विभागों के नाम बदले, यहाँ तक कि टेबल पर रखी गांधीजी की फोटो भी नई छपकर आ गई, लेकिन मैं नहीं बदला। मैं वही रहा — कुर्सी पर तिरछा बैठा हुआ, चश्मा नाक पर टिकाए, फाइल उलटता-पलटता हुआ, जनता को “कल आइए” कहता हुआ एक अनुभवी सरकारी कॉकरोच।

पहले मैं भी इंसान था। प्रतियोगी परीक्षा पास की थी। घरवालों ने मिठाई बाँटी थी। मोहल्ले में सम्मान बढ़ गया था। लोगों ने कहा था — “अब बेटा देश की सेवा करेगा।” मैं भी भावुक हो गया था। मुझे लगा था कि मैं व्यवस्था बदल दूँगा, जनता की समस्याएँ दूर करूँगा, भ्रष्टाचार मिटाऊँगा। फिर नौकरी का पहला दिन आया। अनुभवी बाबू ने मुझे कुर्सी पर बैठाकर पहला ज्ञान दिया — “काम इतना ही करो कि नौकरी चलती रहे, और इतना कम भी मत करो कि अधिकारी नाराज हो जाए।” उसी दिन मेरे भीतर का आदर्शवादी युवक धीरे-धीरे मरने लगा और कॉकरोच जन्म लेने लगा। क्योंकि सरकारी दफ्तर आदर्शवाद का श्मशान और व्यवहारिकता की प्रयोगशाला होता है।

कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह हर परिस्थिति में जीवित रह लेता है। बिजली चली जाए — जीवित। कीटनाशक छिड़क दो — जीवित। घर बदल दो — जीवित। बिल्कुल यही कला सरकारी बाबू में भी होती है। सरकार बदल जाए — जीवित। नई नीति आ जाए — जीवित। विभाग का पुनर्गठन हो जाए — जीवित। जाँच बैठ जाए — जीवित। स्थानांतरण हो जाए — फिर भी जीवित। हम सरकारी बाबू लोकतंत्र के वे जीव हैं जिन पर किसी भी सुधार का स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता। सुधार हमारे ऊपर से ऐसे निकल जाते हैं जैसे बरसात का पानी पुरानी सरकारी इमारत की दीवार से।

मुझे सबसे अधिक आनंद “फाइल” में आता है। भारतीय प्रशासन में फाइल केवल कागज नहीं होती, वह जीवित प्राणी होती है। उसका जन्म होता है, वह यात्रा करती है, टेबल-टेबल घूमती है, टिप्पणियाँ झेलती है, नोटशीटों में संघर्ष करती है और अंततः या तो स्वीकृत होकर स्वर्ग चली जाती है या आपत्ति लगकर पुनर्जन्म ले लेती है। एक साधारण नागरिक सोचता है कि उसने आवेदन दिया है। उसे क्या पता कि उसने एक ऐसी आत्मा को जन्म दिया है जो अगले कई महीनों तक सरकारी गलियारों में भटकती रहेगी। और मैं? मैं उस आत्मा का पुरोहित हूँ। मैं लिखता हूँ — “विचारार्थ प्रस्तुत।” ऊपर वाला लिखता है — “पुनर्विचार करें।” फिर नीचे आता है — “नियमों के आलोक में परीक्षण आवश्यक।” फिर ऊपर जाता है — “स्पष्ट नहीं।” फिर नीचे आता है — “स्पष्ट किया जाए।” इस प्रकार एक फाइल भारतीय लोकतंत्र का तीर्थयात्रा मार्ग पूरा करती है।

कॉकरोच अँधेरे में पनपता है। सरकारी बाबू अस्पष्टता में। जितना कम स्पष्ट नियम होगा, उतनी अधिक हमारी शक्ति होगी। यदि नियम सरल हो जाएँ तो जनता सीधे काम करवा लेगी। फिर हमारा महत्व कहाँ रहेगा? इसलिए व्यवस्था को इतना जटिल बना दो कि आदमी जन्म प्रमाणपत्र बनवाते-बनवाते दर्शनशास्त्री हो जाए। यही कारण है कि भारतीय दफ्तर में सबसे शक्तिशाली आदमी मंत्री नहीं, वह बाबू होता है जिसे पता होता है कि कौन-सा कागज कहाँ अटका है। मंत्री आते-जाते रहते हैं। बाबू स्थायी सत्य है।

मुझे जनता से बहुत प्रेम है। रोज सुबह वह फाइल लेकर आती है। चेहरे पर आशा, हाथ में आवेदन, आँखों में विनम्रता। मैं उसे देखता हूँ और तुरंत समझ जाता हूँ कि यह नया शिकार है या अनुभवी नागरिक। नया नागरिक सीधे पूछता है — “सर, काम कितने दिन में हो जाएगा?” अनुभवी नागरिक धीरे से पूछता है — “कुछ सेवा पानी लगेगा क्या?” यही भारतीय प्रशासनिक संस्कृति का सबसे बड़ा व्यंग्य है। भ्रष्टाचार अब अपराध नहीं, प्रक्रिया का अनौपचारिक भाग बन चुका है। यहाँ रिश्वत को भी इतनी सभ्य भाषा दे दी गई है कि वह नैतिक अपराध कम, सामाजिक शिष्टाचार अधिक लगती है। “कुछ देख लीजिए।” “चाय पानी।” “व्यवस्था।” “सहयोग।” वाह! भारत ने भ्रष्टाचार को भी कितनी सांस्कृतिक गरिमा दे दी है।

धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि सरकारी दफ्तर काम करने की जगह कम, काम को नियंत्रित करने की जगह अधिक है। यहाँ समय अलग गति से चलता है। बाहर दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और डिजिटल क्रांति की बात कर रही होती है, और भीतर हम अभी भी पूछ रहे होते हैं — “तीन प्रतियों में आवेदन कहाँ है?” जनता सोचती है कि कम्प्यूटर आने से व्यवस्था बदल जाएगी। उसे क्या पता कि सरकारी बाबू कम्प्यूटर को भी फाइल संस्कृति सिखा देता है। पहले फाइल लकड़ी की अलमारी में खोती थी, अब “प्रणाली त्रुटि” में खो जाती है। प्रगति केवल माध्यम बदलती है, मानसिकता नहीं।

मुझे सबसे अधिक हास्य निरीक्षण में आता है। जिस कार्यालय में साल भर धूल जमी रहती है, निरीक्षण से एक दिन पहले वह अचानक दुल्हन बन जाता है। टूटे पंखे साफ हो जाते हैं। दीवारों पर नारे चमकने लगते हैं। उपस्थिति पंजिका पूरी भर जाती है। कर्मचारी समय से बैठ जाते हैं। ऐसा लगता है मानो पूरे विभाग में अचानक राष्ट्रभक्ति का विस्फोट हो गया हो। निरीक्षण अधिकारी आता है, चाय पीता है, दो फाइलें उलटता है, गंभीर चेहरा बनाकर कहता है — “कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।” फिर चला जाता है। अगले दिन कार्यालय फिर अपने मूल भारतीय स्वरूप में लौट आता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे घर में मेहमान आने पर लोग कॉकरोच छिपा देते हैं।

कॉकरोच को मारना कठिन होता है। सरकारी बाबू को उससे भी कठिन। कोई शिकायत कर दे? जाँच बैठ जाएगी। जाँच अधिकारी आएगा। फाइलें देखी जाएँगी। बयान होंगे। फिर एक और फाइल बनेगी। फिर टिप्पणी होगी — “प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध नहीं होते।” और मैं फिर उसी कुर्सी पर बैठा मिलूँगा। क्योंकि भारतीय प्रशासन में दंड से अधिक शक्तिशाली चीज प्रक्रिया होती है। यहाँ आदमी गलती से नहीं, प्रक्रिया से थकता है।

मुझे सबसे अधिक आनंद “बैठक” में आता है। भारतीय शासन व्यवस्था बैठकों पर चलती है। समस्या चाहे कितनी भी गंभीर हो, पहले बैठक होगी। फिर उपसमिति बनेगी। फिर सुझाव आएँगे। फिर अगली बैठक होगी। यदि समस्या फिर भी बची रह जाए तो उच्चस्तरीय बैठक होगी। इस देश में कई समस्याएँ इसलिए जीवित हैं क्योंकि वे बैठकों में सुरक्षित रखी गई हैं। और हम बाबू उन बैठकों के आधिकारिक लेखक हैं। हम कार्यवृत्त लिखते हैं — “विस्तृत चर्चा उपरांत निर्णय लिया गया कि विषय पर पुनर्विचार आवश्यक है।” वाह प्रशासन! तुमने निर्णय न लेने की कला को भी दस्तावेजी गरिमा दे दी।

धीरे-धीरे मैं भी बदल गया। पहले जनता की परेशानी देखकर दुख होता था। अब मैं पहले दस्तावेज देखता हूँ। पहले लगता था कि नियम जनता की सुविधा के लिए होते हैं। अब समझ गया हूँ कि जनता को नियमों के माध्यम से नियंत्रित भी किया जाता है। क्योंकि यदि हर काम आसानी से होने लगे तो सरकारी दफ्तर की रहस्यमय महिमा समाप्त हो जाएगी।

कॉकरोच गंदगी में जीवित रहता है। सरकारी बाबू विरोधाभासों में। एक तरफ सरकार कहती है — “डिजिटल भारत।” दूसरी तरफ नागरिक से दस जगह हस्ताक्षर माँगे जाते हैं। एक तरफ कहा जाता है — “भ्रष्टाचार मुक्त शासन।” दूसरी तरफ बिना पहचान के फाइल आगे नहीं बढ़ती। एक तरफ जनता को “जनार्दन” कहा जाता है। दूसरी तरफ वही जनता घंटों लाइन में खड़ी रहती है जबकि कोई प्रभावशाली व्यक्ति सीधे भीतर चला जाता है। यही भारतीय प्रशासन का महान व्यंग्य है — यहाँ समानता का बोर्ड सबसे ऊँचा लगा होता है और असमानता सबसे व्यवस्थित ढंग से लागू होती है।

मुझे नेताओं से भी प्रेम है। वे मंच से भाषण देते हैं — “भ्रष्टाचार खत्म करेंगे।” फिर धीरे से अपने आदमी की फाइल भेज देते हैं — “जरा देख लीजिए।” अधिकारी आदेश देता है। बाबू मुस्कुराता है। व्यवस्था चलती रहती है। लोकतंत्र का यह विशाल रंगमंच भाषणों से नहीं, अनौपचारिक समझौतों से संचालित होता है।

मैं मानता हूँ कि सभी सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट नहीं होते। हजारों लोग ईमानदारी से काम करते हैं। कई अधिकारी और कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में व्यवस्था संभालते हैं। लेकिन सच यह भी है कि पूरी प्रणाली ने धीरे-धीरे ऐसी संस्कृति बना दी है जहाँ काम करना असाधारण माना जाता है और टालना सामान्य। यहाँ दक्षता चौंकाती है और देरी परंपरा कहलाती है।

आज मैं पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ — हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं फाइलों की सीलन, नोटशीटों की धूल, कार्यालयी चाय की गंध, नियमों की भूलभुलैया और जनता की विवशता के बीच जीवित रहने वाला जीव हूँ। मैं हर सरकार के अनुसार अपना व्यवहार बदल लेता हूँ। मैं हर नई योजना को पुराने तरीके से लागू कर लेता हूँ। मैं हर सुधार को प्रक्रिया में बदल देता हूँ। और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जनता मुझे गाली भी देती है और अपने काम के लिए मेरे सामने विनम्र भी बनी रहती है।

शाम को जब कार्यालय खाली होने लगता है, पुराना पंखा चरमराता रहता है, मेज पर धूल जमी फाइलें पड़ी रहती हैं, चाय के कप में मक्खी डूब चुकी होती है और मैं अंतिम टिप्पणी लिख रहा होता हूँ — “अगली कार्यवाही हेतु प्रस्तुत” — तब कभी-कभी सचमुच लगता है कि मैं इंसान नहीं रहा।

मैं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की दरारों में जीवित रहने वाला एक अनुभवी, धैर्यवान, अमर सरकारी कॉकरोच बन चुका हूँ।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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