कविता

बढ़ाओ अपने ही देश का मान!

घर-आंगन की शोभा होते,
प्रेम-प्यार और स्नेह अपार,
ऐसे घर-आंगन में खेलें, सुख,
आनंद और खुशियां हजार।

स्नेह-कपाट, सौहार्द झरोखे,
होते घर-आंगन की शान,
छोटों को मिले प्यार का तोहफा,
बड़ों को मिले मान-सम्मान।

जीवन की आपाधापी में,
भूलें न देश के प्यारों को,
पतझड़ का भी स्वागत कर लें,
खुश हों देख बहारों को।

देश के लिए जीना है, मरना है,
अपने ही घर-आंगन को बनाओ,
क्यों सपना देखो विदेश का,
बढ़ाओ अपने ही देश का मान!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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