रिश्तों की सुगंध
रिश्तों की चुपचाप
एक मीठी सी हवा
दिल को छू जाती है
बिना कहे भी सब
बहुत कुछ कह जाते हैं
अपनेपन के रंग
छोटी सी मुस्कान
बड़ा सा अपनापन
जीवन सजा दे
यादों की परछाईं
मन के आंगन में
धीरे से ठहरती
स्नेह की डोरें
टूटकर भी न टूटें
ऐसा बंधन है
शब्द कम पड़ जाते
भाव अधिक बोलते
रिश्तों की भाषा
दूरी भी पास लगे
जब दिल जुड़े रहें
अनकहा विश्वास
सादगी के पल
रिश्तों को महका दें
फूलों की तरह
हर दिन नया रंग
हर रात नई याद
साथ का एहसास
रिश्ते ही जीवन हैं
उनकी यही सुगंध
मन में बस जाए
— डॉ. अशोक
