इतिहास

भारतीय पार्श्व गायन की मल्लिका सुमन कल्याणपुर

सुरों की मल्लिका सुमन कल्याणपुर (सुमन हेमाड़ी)का जीवन और उनका संगीत-सफ़र सादगी, समर्पण और अद्वितीय उपलब्धियों की एक अनूठी मिसाल है, जिन्होंने 28 जनवरी 1937 को ढाका में जन्म लेने और बचपन में ही मुंबई आने के बाद उस्ताद खान अब्दुल रहमान खान जैसे दिग्गजों से शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल कर फिल्मी दुनिया में अपनी एक ऐसी सशक्त और अमिट पहचान बनाई कि उनकी मखमली व पाकीज़ा आवाज़ दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज करती रही। हालांकि शुरुआती दौर में उनकी आवाज़ की अलौकिक मिठास को स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी के समरूप माना गया, लेकिन सुमन जी ने अपनी बेमिसाल रेंज, गायकी के अनुशासन और गज़ब के ठहराव के दम पर इस चुनौती को पीछे छोड़ते हुए हर बड़े संगीतकार की पसंद बनकर खुद को साबित किया; विशेषकर 60 के दशक में जब मोहम्मद रफ़ी और लता जी के बीच रॉयल्टी विवाद चल रहा था, तब रफ़ी साहब के साथ सुर से सुर मिलाकर कठिन से कठिन गीतों को अमर बनाने का दारोमदार सुमन जी ने ही संभाला और फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ का वो थिरकता हुआ सदाबहार गीत “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर” फिल्म ‘बात एक रात की’ का रूहानी नगमा “ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें” फिल्म ‘सांझ और सवेरा’ का शास्त्रीय बंदिश पर आधारित लाजवाब द्वंद्व गीत “अजहुँ ना आए बालमा, सावन बीता जाए”, फिल्म ‘शगुन’ का अत्यंत भावुक और विरह से भरा गीत “बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों, मोहब्बत के दीवे” फिल्म ‘दिल एक मंदिर’ का मर्मस्पर्शी लोरी नुमा गीत “जुही की कली मेरी लाडली” तथा फिल्म ‘नूरजहाँ’ का शास्त्रीय पुट वाला सुरीला तराना “शराबी शराबी ये सावन का मौसम” जैसे अनगिनत कालजयी गानों के मुखड़ों को अपनी आवाज़ से सँवारकर भारतीय सुगम संगीत

को विशिष्टता और अमरत्व प्रदान किया। हिंदी के साथ-साथ मराठी, बंगाली और गुजराती भाषाओं में भी सैकड़ों यादगार गीत गाने वाली इस महान गायिका ने विवाह के उपरांत चकाचौंध से दूर रहकर पारिवारिक जीवन को चुना, मगर कला के प्रति उनके इसी निश्छल और मूक योगदान का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें साल 2023 में देश के अत्यंत प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान “पद्म भूषण” से नवाज़ा और साथ ही उन्हें ‘महाराष्ट्र भूषण’ व ‘लता मंगेशकर पुरस्कार’ जैसे सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया गया, जो यह तस्दीक करता है कि सुमन कल्याणपुर जी का संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक ऐसी पावन और समृद्ध धरोहर है जो आज भी हमारे बीच उनकी मधुर आवाज पूरी गरिमा से महक रही है।

— डॉ मुश्ताक अहमद शाह सहज

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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