ग़ज़ल
हर तरफ फैला हुआ झूठ का व्यापार है।
बेबसी में डूबता हर आदमी लाचार है।
जो तुम्हारी बाजुओं को दे रहा ताकत वही,
पा गया मौका अगर तो घात को तैयार है।
आग नफरत की लगाते जा रहे चारों तरफ,
जल रही इंसानियत का चलता कारोबार है।
जख्म सीने में छुपा कर घूमता ही वो रहा,
मुल्क की सच्चाइयों को ढक रहा अखबार है।
जिसने थे सपने दिखाए और आश्वासन दिया,
हक हड़पने को हमारा ही सदा तैयार है।
हर तरफ फैली हुई है छल कपट मक्कारियां,
आम जनता को मिला बस झूठ का आभार है।
— वाई. वेद प्रकाश
