वाक्-सिद्ध
रात -रात भर परखा तेरा
भौं -भौं का भौकाल।
बहुत गलत है कुत्सा कहना
कुत्ता भी अपमान
वाक़्-सिद्धि पाई है तुमने
तुम मानव की शान
मुझको कहना है अब तुमको
‘वाक़् -सिद्ध’ सौ साल।
चोरों से रक्षा तुम करते
जागरूक ही करना
उत्तम है संदेश तुम्हारा
सन्नाटे को भरना
स्वर से स्वर का संगम होता
मिली वाक़् से ताल।
‘वाक़् -सिद्ध’ की ऊँची पदवी
देता रचनाकार
तुम भी याद रखोगे कवि को
एक अकिंचन प्यार
‘शुभम्’ न भूले भौं -भौं भोंकन
तू ही एक मिशाल।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम्’
