लघुकथा

ईमानदारी का अभिनय

बड़े साहब का अचानक विभागीय दौरा आ गया, पूरे विभाग में भगदड़ मच गई। कोई फाइल लेकर इधर से उधर दौड़ रहा था, तो कोई पुराने कागज़ों से नई व्यवस्था का भ्रम पैदा करने में जुटा था। चपरासी चाय-पानी के इंतज़ाम में लग गया।
इस विभाग का चार्ज अभी-अभी नये साहब ने संभाला था। अपने दम पर परीक्षा पास करके आये थे। उनको अपने ईमानदारी पर बड़ा गर्व था। कहते थे- “विभाग को उंगली पर बदल दूंगा, कोई एक पाई नहीं लेगा, जिसने ली, उसकी खैर नहीं!”
लेकिन जैसे ही बड़े साहब के दौरे की आहट आई, नये साहब के चेहरे का रंग उड़ गया। घबराकर पुराने और अनुभवी बड़े बाबू के पास पहुंचे हाथ जोड़कर बोले- “बड़े बाबू, बचा लीजिये, बड़े साहब के प्रकोप से कैसे बचे आपसे बेहतर कौन जान सकता हैं!” बड़े बाबू मुस्कुराने लगे और बोले- “साहब,बड़े साहब का गुस्सा देखकर लग रहा कि हजारों में नहीं, लाखों के चढ़ावे पर गुस्सा ठंडा होगा.” फिर क्या था… कुछ देर बाद बड़े साहब के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उन्होंने विभाग की व्यवस्था की प्रशंसा की, कार में बैठे और आगे निकल लिये.
नये साहब ने राहत की लंबी सांस ली और कर्मचारियों से कहा- “साथियों, कल से न्याय, निष्ठा और ईमानदारी का अभिनय पूरी लगन से किया जायेगा !”

— अभिषेक कुमार शर्मा

अभिषेक कुमार शर्मा

कवि अभिषेक कुमार शर्मा जौनपुर (उप्र०) मो. 8115130965 ईमेल as223107@gmail.com indabhi22@gmail.com

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